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जिंदगी में अपने आप से बहस करना कई बार अच्छा लगता है. आपने अपने आप से कभी बहस की है क्या? मैं तो करती हूं और ऐसी हर बहस के बाद अक्सर महसूस होता है कि एक ठोस नतीजा सामने है, एकदम नया आयाम हासिल हुआ. अक्सर सोचती हूं कि किसी कविता को समझने के लिए उसके कवि को समझना जरूरी है क्या? इस सवाल का जवाब कभी हां में मिलता है कभी ना में. ये लीजिए, इस उधेड़बुन में आपको नमस्कार करना तक भूल गई. मगर कहते हैं कि देर आयद दुरुस्त आयद. तो स्वीकार करें न्यूज18 हिंदी के इस स्पेशल पॉडकास्ट में पूजा प्रसाद का नमस्कार. साथियो, आज हम सुनेंगे अपने समय की बेहद महत्त्वपूर्ण रचनाकार गगन गिल की कविताएं. गगन गिल को पढ़ते हुए कई बार लगता है कि उनकी कविताओं को समझने के लिए गगन गिल को भी जानना जरूरी है. आज मैंने उनकी तीन ऐसी कविताएं चुनी हैं, जिससे उनकी कवि चेतना का विशाल वृत तैयार हो सके. अठारह नवंबर उन्नीस सौ उनसठ में जन्मी गगन गिल के कई कविता संग्रह सामने आ चुके हैं. कविता संग्रहों की शुरुआत ‘एक दिन लौटेगी लड़की’ से शुरू हुई थी, फिर आया अँधेरे में बुद्ध. ‘यह आकांक्षा समय नहीं’ की कविताएं स्त्री मन के गहरे परतों की शिनाख्त करती हैं, ‘थपक थपक दिल थपक थपक’ संग्रह की कई कविताएं दिलासा देती हुई हैं. इसके बाद की कविताओं का संग्रह है ‘मैं जब तक आयी बाहर’ और अभी चार-पांच बरस पहले उनकी कविताओं का संग्रह आया ‘देह की मुंडेर पर’. (सुनें पॉडकास्ट: केदारनाथ सिंह की कविताएं)
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साथियो, अब तक के किसी पॉडकास्ट में किसी भी रचनाकार के संग्रहों के बारे में इस तरह से मैंने कभी चर्चा नहीं की थी. आखिर गगन गिल के संग्रहों की चर्चा का मकसद क्या है? इस सवाल का जवाब दूंगी. लेकिन इससे पहले सुनिए उनकी कविता ‘घूम रहे हैं उद्विग्न बुद्ध’
कविता: घूम रहे हैं उद्विग्न बुद्ध
कभी-कभी बुद्ध
उकता जाते हैं
गई रात निकलते हैं तब
चुपके से
हाल जानने दूसरे बुद्धों का
कुछ हैं जो खड़े हैं वनस्पतियों में
कुछ हैं जो लेट गए हैं जाकर
महानिर्वाण की मूर्तियों में
कुछ हँस रहे हैं अभी तक
ऊँचे उठ रहे हैं कुछ मैत्रेय
मंदिरों की छतों से
बाहर आने को
घूम रहे हैं कुछ बुद्ध
उद्विग्न इस पृथ्वी पर
कोई नहीं उत्सुक
उनकी बात सुनने को
कोई-कोई बुद्ध एकदम
गुमसुम हो गए हैं
बची नहीं एक भी बात
बुद्धों के पास
बोध के बाद
आपस में करने को
संसार जल रहा है अभी तक
उसी तरह
दलदल में धँसे हैं
अभागे उसी तरह
थक गई है अग्नि
थक गया है बोध
थक गया है बैल भी
पृथ्वी के नीचे
बुद्ध भी थक गए हैं
बुद्ध होते-होते
बुद्ध हो जाना आसान नहीं होता, मोह-रोग-शोक-सुख से उबरना हर के बूते की बात नहीं होती. ठीक वैसे ही जैसे अबके दौर में मनुष्यता बचाए रखना सबके बूते की बात नहीं रह गई. ध्यान दिलाना चाहती हूं कि गगन गिल यानी एक स्त्री की दृष्टि अपने आसपास देखती है, जिंदगी के बिल्कुल अनछुए पहलुओं को महसूसती है और उन्हें कविताओं में उतार देती है ‘घूम रहे हैं उद्विग्न बुद्ध’ की तरह. इन अनुभवों के संग्रह का नाम होता है ‘अँधेरे में बुद्ध’. तो इनका जो पहला संग्रह था – ‘एक दिन लौटेगी लड़की’, वह लड़की कहीं गई नहीं थी, बल्कि वह तो बुद्धों को अंधेरे में देख रही थी. भटक रही थी अपने आसपास. देख रही थी ‘यह आकांक्षा समय नहीं’, लेकिन उन आकांक्षाओं को वह स्वर दे रही थी. इस तरह गढ़कर कविता – एक इच्छा चूड़ियों में. (पॉडकास्ट: राहत इंदौरी की राहत देतीं ग़ज़ल, नज़्म और शायरी)
कविता: एक इच्छा चूड़ियों में
एक इच्छा लड़की की चूड़ियों में चलती है
पहले वह टूटें उसके बिस्तर पर
फिर टूटें उसकी चौखट पर
लेकिन चौखट पर क्यों?
क्योंकि लड़की के भीतर एक शोकमयी औरत है
और जो विधवा है
है नहीं लेकिन
हो जाएगी जो
लड़की का डर उसकी धमनियों से काँपता
चूड़ियों तक चलता है
काँपती है उनमें लड़की की इच्छा
काँपता है उनमें लड़की का शोक
शोक?
आदमी कहाँ है लड़की का?
आदमी जिसका मातम उसकी धमनियों में है
और इच्छा जिसकी उसकी चूड़ियों में
आदमी उसका फँसा है
किसी दूसरी देह में
किसी दूसरे सपने में,
दूसरे दुख, दूसरे आँसू में
उसका हर दुख, सपना, आँसू
लड़की की मातमी पकड़ से परे है…
लेकिन लड़की तो लड़की है
उसमें वही आदिम भोलापन
पागलपन, मरनपन भरा है
जिसकी सज़ा
किसी आने वाले कल
वह उस आदमी को देगी
जब तोड़ेगी अपनी चूड़ियाँ…
चूड़ियां टूटने का शोक स्त्री के भीतर तो होता है, पर स्त्री खुद को टूटने नहीं देती. वह कांच की दिखती तो है, पर होती नहीं. वह होती है फौलादी कामनाओं वाली, चट्टानी इच्छाओं वाली. इसीलिए तो गगन गिल को पूरा भरोसा होता है ‘एक दिन लौटेगी लड़की’. आइए सुनें उनकी यह कविता
कविता: एक दिन लौटेगी लड़की
एक दिन लौटेगी लड़की
एक दिन लौटेगी लड़की
हथेली पर जीभ लेकर
हाथ होगा उसका लहू से लथपथ
मुँह से टपका लहू कपड़ों में सूखा हुआ
फिर धीरे-धीरे मुँह उसका आदी हो जाएगा
कपड़ों के ख़ुशनुमा रंग उसके चेहरे पर लौटेंगे
सोचेगी नहीं वह भूलकर भी
अपनी हथेली के बारे, जीभ के बारे में
क्योंकि लड़की कुछ नहीं सोचेगी,
और इस तरह दहशत से परे होगी
या कहें कि दहशत के बीचोबीच
लड़की में कुछ नहीं काँपेगा
ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे धड़कता हुआ कह सकें।
सिर्फ़ कभी-कभी उसमें
एक सपना धड़केगा
या सपने में लड़की
उस कभी-कभार वाले दिन लड़की निकलेगी
सपने की नाल से अलग लिथड़ी देह लेकर
उस दिन से बहुत दिनों दूर
हथेली पर जीभ खींच लाए।
उस दिन से बहुत दिनों दूर
सपने में लड़की झाँकेगी
अंधे कुएँ में
भीतर होगी जिसके अंधी एक और लड़की
आँखें जिसकी देखेंगी जिसे भी
अंधा कर देंगी…
लड़की सोचेगी—
जो हिस्सा अंधा होना था, हो गया
जो चुप होना था, वह हो गया
जो लाचार होना था, वह भी हो गया
फिर अब भला वह क्या करती है
अंधे कुएँ में बैठी?
वह यह सब सोचेगी, लेकिन सिर्फ़ सपने में
दिखने में तो बाहर से वह ख़ुशमिजाज़ होगी
मुँह उसका ज़ुबान बिना आदी
आँखें उसकी दृश्यों से दूर
रंग उसके चेहरे में गड्डमड्ड
ज़ुबान के बारे में वह कभी नहीं सोचेगी
भूलकर भी नहीं
न ज़ुबान के बारे में
न हथेली के बारे में
न होंठों के बारे में
एक दिन लौटेगी लड़की से शुरू हुआ कविता संग्रहों का दौर फिलहाल ‘देह की मुंडेर पर’ ठहरा है. इन संग्रहों के नाम से बस यह ध्यान दिलाना चाह रही थी कि गगन गिल के भीतर की स्त्री कितनी मजबूत है कि वह शोक में भी रोग में भी संघर्षशील है. उनकी कविताओं के पहले संग्रह से लेकर अबतक के संग्रह की कविताओं पर एक दृष्टि डालें तो महसूस करेंगे कि उनकी कविताएं स्त्री रुदन की कविताएं नहीं बल्कि संघर्ष और आशावाद की कविताएं हैं. स्त्री के भीतर की हलचल की कविताएं हैं और इस नाते जाहिर हैं कि ये कविताएं स्त्री मन की कविताएं हैं. साथियो, वक्त हो चला है विदा लेने का. पूजा को इजाजत दीजिए. फिर मिलूंगी किसी और रचनाकार की रचनाओं के साथ अगले पॉडकास्ट में. नमस्कार.
कविताएं साभार: कविताकोश
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