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हालांकि पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि नई राजधानी बड़े पैमाने पर वनों की कटाई का कारण बनेगी। इससे कई लुप्तप्राय प्रजातियों और स्वदेशी समुदायों के आवास को खतरा पैदा हो सकता है। न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस की खबर के अनुसार, जकार्ता की आबादी लगभग 1 करोड़ है। इसे दुनिया का सबसे तेजी से डूबने वाला शहर कहा जा रहा है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि मौजूदा दर से 2050 तक शहर का एक तिहाई हिस्सा पानी में डूब सकता है।
क्यों बदलनी पड़ रही है राजधानी?
इसका मुख्य कारण अनियंत्रित भूजल निकासी है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते जावा सागर ने इसे और बढ़ा दिया है। शहर की हवा और भूजल बेहद प्रदूषित हो चुके हैं। यहां अक्सर बाढ़ आती है। शहर में भीड़भाड़ इतनी बढ़ गई है कि अर्थव्यवस्था को प्रति वर्ष 4.5 बिलियन डॉलर का खर्च उठाना पड़ता है। नई राजधानी के निर्माण से पर्यावरणविद काफी चिंतित हैं। सरकारी इमारतों का निर्माण जंगलों की कटाई का कारण बनेगा। एपी के डेटा विश्लेषण से पता चला है कि आने वाले साल में इस क्षेत्र में भयानक गर्मी भरे दिन बढ़ सकते हैं।
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गांवों को उखाड़ कर बस रही राजधानी
निर्माण के कारण 100 से अधिक स्वदेशी बालिक (Balik) लोगों वाले कम से कम पांच गांवों को स्थानांतरित किया जा रहा है। भवन निर्माण स्थल के विस्तार के साथ और अधिक गावों के उखड़ने की आशंका है। सरकार का कहना है कि नई राजधानी को स्थानीय समुदाय के नेताओं से समर्थन मिल रहा है। उन लोगों को मुआवजा दिया गया है जिनकी जमीन शहर के लिए इस्तेमाल की जा रही है। एक स्थानीय नेता का कहना है कि समुदाय के सदस्य सरकार की ओर से दिए जा रहे पैसे को लेने के लिए मजबूर महसूस कर रहे हैं।
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