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शिवसेना और एनसीपी में विभाजन के बाद महाराष्ट्र में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास अब कुल 185 विधायक हैं। भारतीय जनता पार्टी के पास 105 विधायक हैं। वहीं, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के 40 और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के खेमे के 40 विधायकों का समर्थन सरकार को है। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह नया गठजोड़ महाराष्ट्र में भाजपा के हित में साबित होगा या नहीं?
भाजपा और शिवसेना ने 2019 का लोकसभा चुनाव में साथ लड़ा। 48 में से 41 सीटों पर जीत मिली थी। भाजपा 23 और शिवसेना 18 सीटें जीतीं। 2019 में ही होने वाले विधानसभा चुनाव में भी यही स्थिति बनी। एनडीए के खाते में 161 सीटें आईं। बीजेपी 25.75% वोट शेयर के साथ 105 सीटें हासिल कीं। वहीं, शिवसेना 56 सीटों और 16.41% वोट शेयर के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी। हालांकि, बाद में शिवसेना का रास्ता अलग हो गया। महाराष्ट्र में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की सरकार बनी।
इस राजनीतिक गठबंधन का भविष्य भी लंबा नहीं रहा। तीन बड़ी पार्टियों और उनके वोट बैंक के एक साथ आने से भाजपा के लिए लोकसभा की राह मुश्लिक दिखने लगी थी। इसी समय महाराष्ट्र में बड़ा सियासी हलचल पैदा होता है। एकनाथ शिंदे के बागी तेवर ने उद्धव ठाकरे से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली। बाद में शिंदे की अगुवाई में बीजेपी की सरकार बनी। एकनाथ शिंदे के साथ 56 में से 40 विधायक आए।
शिवसेना का विभाजन भाजपा की पहली बड़ी सफलता
महाराष्ट्र में शिवसेना एक प्रमुख हिंदुवादी पार्टी है। इसके कई विधायक एमवीए की विचारधारा और राजनीतिक शैली के साथ सहज नहीं थे। एनसीपी और कांग्रेस की “धर्मनिरपेक्ष” वाली राजनीति उन्हें रास नहीं आ रही थी। यही कारण हैं कि विद्रोही विधायकों ने महाराष्ट्र में नई सरकार बनाने के लिए भाजपा के साथ गठबंधन करने का फैसला किया। शिंदे को मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया। चुनाव आयोग द्वारा विद्रोही गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न दिए जाने के बाद शिवसेना दो भागों में विभाजित हो गई।
शिवसेना को मुंबई और कोंकण क्षेत्रों में प्रभावशाली माना जाता है। मुंबई, ठाणे और कल्याण में भी एक प्रमुख राजनीतिक ताकत माना जाता है। मराठा समुदाय, हिंदुत्व के अनुयायी और शहरी मध्यम वर्ग को इसके मुख्य समर्थकों के रूप में देखा जाता है। भाजपा ने 39 विधायकों, 12 सांसदों और शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे के एक हिस्से के साथ एकनाथ शिंदे पर बड़ा दांव लगाया है।
एकनाथ शिंदे इन इलाकों में मजबूत
एकनाथ शिंदे को ठाणे और कल्याण-डोंबिवली नगरपालिका क्षेत्रों में एक मजबूत नेता के रूप में देखा जाता है। यहां कई नगरसेवक और पार्टी कार्यकर्ताओं ने उनका समर्थन किया है। इन इलाकों बाल ठाकरे का भी वर्चस्व था, लेकिन 2019 के चुनाव में बांद्रा पूर्व विधानसभा सीट पर शिवसेना हार गई थी। आपको बता दें कि ठाकरे परिवार का निवास मातोश्री बांद्रा पूर्व में ही है। इस क्षेत्र को उनके गृह क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। मतदाताओं से उद्धव ठाकरे ने भी अपील की थी।
एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के 70% उम्मीदवार यानी विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिले 16.41% वोटों में से लगभग 12% अपने साथ ले आए। भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव में इस चुनावी अंकगणित को भुनाने की कोशिश करेगी।
अजित पवार की वापसी ने बनाया भाजपा का खेल
एकनाथ शिंदे के ठीक एक साल बाद एनडीए सरकार में अजित पवार की एंट्री होती है। वे भी अपने साथ एनसीपी के बागी विधायकों को लेकर आए हैं। डिप्टी सीएम बनने से पहले शरद पवार के भतीजे महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता थे। अजित पवार का दावा है कि उन्हें पार्टी के 40 विधायकों का समर्थन प्राप्त है और वे शिवसेना के विद्रोही गुट की तरह ही एनसीपी के नाम और चुनाव चिह्न पर भी दावा कर रहे हैं।
अजित पवार और कई एनसीपी विधायक 2019 चुनावों में ही भाजपा में शामिल होना चाह रहे थे। तब उनके पास उतनी संख्या नहीं थी जितनी वे अब होने का दावा करते हैं। प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, दिलीप वाल्से पाटिल, हसन मुश्रीफ और धनंजय मुंडे जैसे कई बड़े एनसीपी नेता उनके खेमे में शामिल हो गए हैं। अजित पवार खेमा 40 एनसीपी विधायकों और एमएलसी के अलावा सांसदों के हलफनामों के साथ चुनाव आयोग में गया है। उन्होंने 30 जून को खुद को पार्टी का अध्यक्ष चुना है। उनके गुट ने भी दावा किया है पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न उनका है।
अब बड़ा सवाल यह है कि अजित पवार गुट लोकसभा चुनाव में एनडीए को कितनी मदद कर सकता है, क्योंकि शरद पवार अभी भी महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ी हस्तियों में से एक हैं और एनसीपी का राजनीतिक अस्तित्व अभी भी उनके नाम के साथ जुड़ा हुआ है।
मराठा समुदाय और मुस्लिमों को एनसीपी के प्रमुख समर्थकों के रूप में देखा जाता है। पश्चिमी महाराष्ट्र और विशेषकर पुणे जिला एनसीपी का गढ़ माना जाता है। इसका सबसे बड़ा वोट शेयर पुणे, सतारा, सांगली, कोल्हापुर और सोलापुर जैसे जिलों से आता है, जिन्हें महाराष्ट्र का चीनी बेल्ट भी कहा जाता है। इस क्षेत्र में मराठा समुदाय का वर्चस्व है। पश्चिमी महाराष्ट्र में 10 लोकसभा और 60 विधानसभा सीटें हैं।
अजित पवार और विद्रोही गुट के लिए बड़ी परीक्षा यह होगी कि शरद पवार के बगैर क्या वह अपने खेमे के सियासी वजूद को जिंद रख पाएंगे। 2024 का लोकसभा चुनाव मराठा मतदाताओं को आकर्षित करने और लुभाने के लिए शरद और अजित पवार दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा के चुनावी गणित के लिए अजित पवार के गुट के पास अपना राजनीतिक आधार होना जरूरी है।
असमंजस में विपक्ष
केवल 31 महीनों में एमवीए के पतन भाजपा की ताकत को बढ़ा दिया है। लोकसभा चुनाव में ज्यादा समय नहीं बचा है। राज्य में विपक्षी वोट बैंक पूरी तरह से अव्यवस्थित है। दो साल में दो बड़े विभाजन देखे गए हैं। ऐसे में एमवीए की प्रभावशीलता पर पश्न खड़ा हो रहा है। मतदाताओं को भी इस दुविधा का सामना करना पड़ सकता है कि चुनाव में किसका समर्थन किया जाए।
उद्धव ठाकरे सुप्रीम कोर्ट में शिवसेना पर कंट्रोल और सरकार की बहाली के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं, एनसीपी कानूनी विकल्पों पर दो सुर में बोल रही है। शरद पवार कानून लड़ाई से इनकार रह रहे हैं, जबकि उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि हम कानूनी विकल्प तलाश रहे हैं। यदि कांग्रेस पार्टी में भी गुटबाजी चरम पर पहुंच जाए तो क्या होगा? फरवरी में वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री बालासाहेब थोराट ने प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले को दोषी ठहराते हुए विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दिया था। उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन इससे एक बार फिर पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की कलह उजागर हो गई।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि एमवीए की दो पार्टियां अस्तित्व के संकट का सामना कर रही हैं और तीसरी की संभावना भी अच्छी नहीं है। महाराष्ट्र की राजनीति में विपक्ष का भविष्य अंधकारमय दिख रहा है और इससे केवल भाजपा को मदद मिलने की उम्मीद है।
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