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कुछ दिनों पहले एक कथा सुनी थी. इसमें एक पिता अपने किशोर उम्र के बच्चे के साथ ट्रेन में सफर कर रहा था. बच्चा खिड़की के बाहर पेड़, जानवर, आकाश आदि देख कर खूब खुश हो रहा था. वह तालियां बजा-बजा कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रहा था. सहयात्री के लिए यह आश्चर्यजनक था कि पेड़ आदि देख कर इतना बड़ा किशोर कैसे उछल रहा है. वह देर तक यह सब देखता रहा और जब उससे रहा नहीं गया तो उसने पूछ ही लिया, क्या यह पहली बार पेड़ देख रहा है? पिता ने हां, कहा तो उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रही. उस यात्री की जिज्ञासा को भांप कर पिता ने बेटे को दुलराते हुए कहा कि असल में यह अब तक देख नहीं सकता था. इसकी आंखों का प्रत्यारोपण हुआ है. दिखाई देने के बाद यह पहली बार रेल यात्रा कर रहा है. अब पिता-पुत्र की प्रसन्नता में वह सहयात्री भी शामिल था.
ऐसे ही एक श्रीलंकाई विज्ञापन भी वायरल हुआ था, जिसमें एक नेत्रहीन बच्चा प्लेटफॉर्म पर बैठा है. पास में बैठा एक व्यक्ति किताब पढ़कर हंसने लगता है. बच्चा उस आदमी से पूछता है कि वो क्यों हंस रहा है तो वो किताब में लिखा किस्सा उसे पढ़कर सुनाता है. लड़का भी किस्सा सुनकर जोर-जोर से हंसने लगता है. फिर बच्चा पूछता है कि क्या वह पूरा कर उसे दे सकता है? व्यक्ति पूछता है, क्या किताब? बच्चा कहता है, नहीं, आंखें. इसके बाद संदेश आता है कि आपकी आंखें जब देखना पूरा कर लें तो किसी और को देखने के लिए दान कर दें.
ये दो उदाहरण हमारे दिल को छू लेते हैं, फिर भी नेत्रदान को लेकर हम सब में उदासी क्यों है, यह समझ से परे हैं. नेत्रदान को लेकर हमारी अज्ञानता, असमंजस और लापरवाही को दूर करने के लिए ही हर वर्ष 10 जून को विश्व नेत्रदान दिवस मनाया जाता है. हर साल यह दिन मनाया जाता है, ताकि नेत्रदान को लेकर हमारी भ्रांतियां दूर हो सकें.
इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थेल्मोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन बताता है कि भारत में नेत्रदान न करने के पीछे कोई सांस्कृतिक या धार्मिक कारण नहीं हैं, बल्कि गलत सूचना और दान किए गए ऊतक के उचित उपयोग न होने के कारण अधिक हैं. नेत्रदान को लेकर कई सारे मिथक हैं जिन्हें तोड़ने की जरूरत है. कई लोग मानते हैं कि नेत्रदान करने से अगले जन्म में नेत्रहीन पैदा होंगे, धर्म नेत्रदान की अनुमति नहीं देता है, नेत्रदान से शरीर विकृत हो जाता है, नेत्रदान के दौरान मृतक की पूरी आंखें निकाल ली जाती हैं और आंखों की जगह गड्डे बन जाते हैं, आदि आदि. इन धारणाओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. यह समझना बेहद जरूरी है कि नेत्रदान के लिए आंखें नहीं निकाली जाती हैं, सिर्फ आगे की पुतली यानी कार्निया निकाला जाता है जिससे मृतक का चेहरा देखने में बुरा नहीं लगता है.
एक आंकड़े के अनुसार भारत में लगभग 1.25 करोड़ लोग दृष्टिहीन हैं, जिसमें करीब 30 लाख व्यक्ति नेत्र प्रत्यारोपण के माध्यम से नवदृष्टि प्राप्त कर सकते हैं. आकलन बताता है कि एक वर्ष में देश में जितने लोगों की मृत्यु होती है, अगर सभी के नेत्रों का दान हो जाए तो देश के सभी नेत्रहीन लोगों को एक ही साल में आंखें मिल जाएंगी. मगर लोग नेत्रदान करते नहीं हैं और कार्निया प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची लंबी होती जाती हैं.
कोरोना काल में तो नेत्रदान की संख्या और कम हो गई है. खतरा केवल यही नहीं है, अपनी लापरवाही के कारण दुनिया धीरे-धीरे अंधत्व की तरफ बढ़ रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मोतियाबिंद और ग्लूकोमा के बाद कॉर्निया की बीमारियां (आंखों की अगली परत कार्निया का क्षतिग्रस्त होना) आंखों की रोशनी जाने की प्रमुख वजहें हैं. अंधत्व की समस्या से गुजर रहे 92.9% लोगों को अंधा होने से बचाया जा सकता है. इसे प्रिवेंटेबल ब्लाइंडनेस यानी रोका जा सकने वाला अंधत्व भी कहा जाता है.
जरूरत होने पर भी आंखों का चश्मा नहीं लगाना, मोतियाबिंद का ऑपरेशन नहीं करवाना और ग्लूकोमा की समय-समय पर जांच नहीं करवाने, कंप्यूटर और मोबाइल पर ज्यादा काम करने से अधिकांश लोगों की आंखों को नुकसान पहुंच रहा है. बदलती लाइफस्टाइल, अनियमित दिनचर्या, प्रदूषण और बहुत ज्यादा स्ट्रेस होने की वजह से ज्यादातर लोग आंख से जुड़ी समस्याओं का शिकार होने लगे हैं. ऑनलाइन क्लासेस और कंप्यूटर का इस्तेमाल बढ़ने से बच्चों और युवाओं की आंखों में सूखेपन की समस्या बढ़ी है.
आज देश के कई नेत्रहीनों को हमारी आंखें नई रोशनी दे सकती हैं, मगर इसके लिए सबसे पहले हमें जीवित रहते हुए अपनी आंखों और उनकी रोशनी का ध्यान रखना और मृत्यु उपरांत नेत्रदान करना जरूरी है. जिस तरह से हमारी दिनचर्या बिगड़ रही हैं, हमें अपनी आंखों की देखभाल करने के लिए कुछ कार्य जरूर करना चाहिए जैसे, अच्छी दृष्टि के लिए संतुलित आहार का सेवन करें. अपने आहार में हरी पत्तेदार सब्जियों, अंडे, फलियों एवं गाजर को अधिक से अधिक मात्रा में शामिल करें. आंखों की सुरक्षा के जतन करें. आंखों के बेहतर स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए अपनी आंखों की नियमित जांच कराएं. यदि आप कंप्यूटर और मोबाइल पर लंबे समय तक काम करते हैं तो आंखों का सूखापन बढ़ सकता है.
नेत्ररोग विशेषज्ञ बताते हैं कि 20 -20 -20 के फार्मूले से सूखेपन की समस्या से काफी हद तक निजात पाया जा सकता है. यानी 20 मिनट तक मोबाइल या कंप्यूटर में काम करने के बाद 20 सेकंड तक थोड़ी दूर की वस्तुओं को देखना चाहिए. ऐसा हर बार करें तो आंखों के सूखेपन की समस्या नहीं आती है.
विश्व नेत्रदान दिवस पर नेत्रदान के बारे में कुछ बातें जानना आवश्यक हैं, ताकि हमारी भ्रांतियां दूर हो सके और हमारे बाद भी हमारी आंखें दो लोगों की जिंदगी में रोशनी ला सकती हैं. इसलिए जीवित रहते हुए अपनी दृष्टि को बेहतर बनाने का प्रयास करें और अपने बाद औरों को रोशन करने का संकल्प लें.
कौन कर सकता है नेत्रदान
चश्मा पहनने वाले, डायबिटीज, अस्थमा, हाई ब्लड प्रेशर और अन्य शारीरिक विकारों जैसे सांस फूलना, हृदय रोग, क्षय रोग आदि के रोगी नेत्र दान कर सकते हैं. मोतियाबिंद, कालापानी या आंखों का ऑपरेशन करवाने वाले व्यक्ति भी आसानी से नेत्र दान कर सकते हैं.
कौन नहीं कर सकता नेत्रदान
कार्निया की खराबी, एड्स, हैपेटैटिस, पीलिया, ब्लड कैंसर, रेबीज (कुत्ते का काटा), सेप्टीसिमिया, गैंगरीन, ब्रेन टयूमर, संक्रमण जैसे गंभीर रोगों से पीड़ित व्यक्ति नेत्रदान नहीं कर सकते हैं.
कितना वक्त लगता है?
नेत्रदान की पूरी प्रक्रिया बेहद आसान है जो मात्र 15-20 मिनट में पूरी भी हो जाती है. मृत्यु के पश्चात 6 घंटे तक नेत्रदान किया जा सकता है. इस अवधि के बाद आंख के आगे की पुतली खराब हो जाती है, जिससे इसका उपयोग नहीं किया जा सकता है.
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Tags: Eye Donation, Eyes, Health problems
FIRST PUBLISHED : June 10, 2023, 14:29 IST
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