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सफदर हाशमी नया शब्द है, इसका मतलब है जागना | – News in Hindi – हिंदी न्यूज़, समाचार, लेटेस्ट-ब्रेकिंग न्यूज़ इन हिंदी

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सफदर हाशमी नया शब्द है, इसका मतलब है जागना | – News in Hindi – हिंदी न्यूज़, समाचार, लेटेस्ट-ब्रेकिंग न्यूज़ इन हिंदी

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साथ-साथ, साथ-साथ, कैसा है यह साथ? कौन देता है यह साथ? कौन मानता है यह साथ? किसे मिलता है यह साथ? मुझे मिलती है. सिर्फ लात. किसकी लात? अजी सबकी, मकान-मालिक की लात, मिल मालिक की लात, राशनवाले की लात, दूधवाले की लात और पुलिसवाले की लात! लात खाते-खाते भेजा ही खराब हो गया, बताना ही भूल गया मैं हूं क्या बला? मैं हूं मजदूर, मशीन का एक पुर्जा, काम की चीज, मगर बेकार की चीज. काम करता हूं मशीन का, मशीन के मालिक का और उसके बाद कुछ नहीं. कम-से-कम मालिक के लिए कुछ भी नहीं. तन्ख्वाह मांगो तो मुश्किल, न मांगो तो मुश्किल. छुट्टी मांगो तो छंटनी, बोनस मांगो तो चटनी.

ये उस नाटक ‘मशीन’ की पंक्तियां हैं जिसने देश में नुक्‍कड़ नाटक को लोकप्रियता की राह दिखाई. सफदर हाशमी द्वारा लिखा गया नाटक ‘मशीन’ जिसे दिल्‍ली में डेढ़ लाख लोगों ने एक साथ देखा, जिसे देशभर में हजारों बार खेला गया. लोकप्रियता का शीर्ष ऐसा जैसे मजदूरों की पीड़ा को ऐसे शब्‍द पहले मिले ही नहीं. जैसे नाटक को मंच से उतार कर जनता के बीच, उनके नुक्‍कड़ तक ले जाने वाला सूत्रधार सफदर हाशमी पहले कभी हुआ ही नहीं. बाद में भी नहीं. सफदर हाशमी कुल 34 बरस ही जिए थे, अब उनके न होने को 34 बरस हो गए हैं. आज सफदर हाशमी के न होने 34 के सालों बाद भी देश में नुक्‍कड़ नाटक किसी के कारण पहचाना जाता है तो वे सफदर हाशमी हैं. आज उन्‍हीं सफदर हाशमी का जन्‍मदिन है.

वे नुक्‍कड़ नाटक के पर्याय है इसीलिए उनका जन्‍मदिन नुक्‍कड़ नाटक दिवस के रूप में मनाया जाता है. 12 अप्रैल 1974 को दिल्‍ली में जन्‍मे सफदर हाशमी के जीवन के बारे में सुधन्वा देशपांडे ने अपनी किताब ‘हल्ला बोल: लाइफ एंड डेथ ऑफ सफदर हाशमी’ में विस्‍तार से लिखा है. उनके कृतित्‍व और व्‍यक्तित्‍व पर राजकमल प्रकाशन ने ‘सफदर’ पुस्तिका का प्रकाशन किया है जिसमें हबीब तनवीर, एमके रैना, प्रसन्‍ना ने सफदर के कृतित्‍व पर बात की है तो सफदर के आलेखों व नाटकों का संकलन भी है.

सफदर कैसे नुक्‍कड़ नाटक वाले सफदर हाशमी हो पाए इसे जानने के लिए उनके बचपन को जानना चाहिए. सुधन्‍वा देशपांडे के अनुसार हैं कि सफदर जन्‍मे जरूर दिल्‍ली में मगर उनके पिता 1952 में अलीगढ़ जाकर बस गए थे और 1954–55 के जाड़ों में उनकी पत्नी और बच्चे भी अलीगढ़ चले गए. उस वक्‍त सफदर की उम्र दस महीने के आसपास रही होगी. घर में साहित्य का बोलबाला था, जो नन्‍हे सफदर का व्‍यक्तित्‍व गढ़ता रहा. करीब दस साल बाद 1964 में सफदर का परिवार फिर दिल्‍ली पहुंच गया. सफदर ने 1970 में कॉलेज में प्रवेश लिया. उनके पिता और भाई चाहते थे कि सफदर हिंदू कॉलेज में पढ़ें मगर सफदर ने एलीट माने जाने वाले सेंट स्टीफंस कॉलेज में अंग्रेजी ऑनर्स में प्रवेश लिया. उस वक्‍त सफदर का अंग्रेजी में हाथ तंग था फिर भी सेंट स्टीफंस में प्रवेश मिला क्योंकि इंटरव्यू कमेटी में किसी सदस्‍य को लगा था कि ये लड़का इंटेलीजेंट है और उसे हिंदी में बोलने की छूट दी गई थी.

हिंदी में बात करते हुए सफदर इंटरव्यू कमेटी को प्रभावित करने में सफल रहे. एलीट कॉलेज में सफदर पढ़े जरूर मगर उन्‍हें अंग्रेजीपरस्त माहौल पसंद नहीं आता था. उसी दौरान वह सेंट स्टीफंस में सक्रिय नक्सलवादी विद्यार्थियों के एक समूह की तरफ आकर्षित हुआ. इसका एक कारण यह भी था कि सफदर की तरह उनके पास भी कैफे से कुछ खरीदने के लिए पैसे नहीं हुआ करते थे. नक्सलवाद के साथ सफदर का आकर्षण कुछ दिनों में ही खत्‍म हो गया. इसका कारण सोच में बुनियादी अंतर था. जैसा कि सुधन्‍वा देशपांडे ने लिखा है, तकरीबन एक दशक बाद सफदर ने अपने घनिष्‍ठ मित्र प्रभात उप्रेती को एक पत्र में लिखा था:

स्टेनगन लेकर “दो-चार कमीनों” को मारने की कोई ख़्वाहिश नहीं है. ऐसा करने वालों पर, सोचने वालों पर, तरस आता है. जी चाहता है उन्हें समझाऊं कुछ, आंखें खोलूं उनकी … (उन्होंने) इंकलाब के रास्ते पर झूठी बहादुरी और महानता का बैरीकेड खड़ा किया था. इनसे प्रेरित होगे तो बर्बाद हो जाओगे.

यही वह सोच थी जिसके चलते सफदर ने नाटकों को मंच से उतार कर जनता के बीच ले जाने का जतन किया. यही वह सोच थी जिसने सफदर से लिखवाया:

पढ़ना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो

पढ़ना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो

क ख ग घ को पहचानो

अलिफ़ को पढ़ना सीखो

अ आ इ ई को हथियार

बनाकर लड़ना सीखो.

देश में नुक्‍कड़ नाटक का स्‍वर्णकाल आपातकाल के बाद शुरू होता है. इसके पहले वर्ष 1973 में इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) से अलग हो कर सफदर और कुछ साथियों ने जन नाट्य मंच (जनम) का गठन किया था. आपातकाल के बाद जनम ने अपना विस्‍तार करना शुरू किया था. उसके पहले सफदर जनता के बीच नाटक किया करते थे मगर खुले मंच पर. नुक्‍कड़ नाटक के जरिए वे अपने कहन को मंच से उतार कर एकदम जनता के बीच ले गए. चौक-चौराहे, गली-मोहल्ले, झुग्गी-झोपड़ी, हड़ताल-आंदोलन में, फैक्ट्रियों के आस-पास या कॉलेज-विश्वविद्यालय में एकदम घेरा बना कर खड़ी जनता के बीच. किसी चौक-नुक्‍कड़ पर पुकारा जाजा ‘आओ आओ, नाटक देखो, नाटक देखो…’ कुछ कविताएं और जनगीत. इस तरह नुक्‍कड़ नाटक की लहर उठी और देश भर में छा गई.

मजदूरों, मेहनतकशों के लिए, उनके बीच किए जाने वाले नाटकों के लिए कभी नाटक लिखे ही नहीं गए थे. यह काम भी खुद सफदर ने अपने एक सहयोगी जनम के संस्थापक सदस्य राकेश सक्सेना के साथ मिल कर पूरा किया. शुरुआती नाटक था ‘मशीन’ (1978) और ‘औरत’ (1979). मशीन ऐसा नाटक था जिसे पूरे देश में अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग तरह से मंचित किया गया. इस नाटक में एक कारखाने के अंदर कैंटीन और साइकिल स्टैंड की मांग पर मजदूरों की प्रताड़ना का मुद्दा उठाया गया था. यह नाटक का मूल स्‍वर मशीनी होते समाज के बारे में था.

फिर 1 जनवरी 1989 भी आई जब मजदूरों के हक में ‘हल्ला बोल’ नाटक के मंचन के दौरान सफदर हाशमी पर झंडापुर, साहिबाबाद (गाजियाबाद) में एक नेता के समर्थकों ने हमला कर दिया था. अगले दिन सफदर की मौत हो गई थी. दो दिन बाद 4 जनवरी को सफदर की साथी और पत्नी मलयश्री ने उसी जगह पर जाकर अधूरे नाटक को पूरा किया था. यह भारतीय कला इतिहास की अनूठी घटना है जिसमें कला के प्रति समर्पण और निष्‍ठा दिखाई देती है.

संदर्भ मिलता है कि सफदर का जन्मदिन 12 अप्रैल को नुक्‍कड़ नाटक के रूप में मनाया जाए ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई. मगर यह सफदर के प्रति प्‍यार ही था कि पूरे देश में अनायास ही उनके जन्‍मदिन को राष्ट्रीय नुक्कड़ नाटक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. जन नाट्य मंच की गतिविधियों खासकर सफदर हाशमी के कारण कई सुप्‍त समूह सक्रिय हो उठे. उनके लिखे नाटक ‘मशीन’, ‘राजा का बाजा’, ‘हल्ला बोल’ और ‘औरत’ का मंचन होता रहता है.

उस दिन 1 जनवरी 1989 को यदि नाटक में देरी नहीं होती यानी वह तय समय पर एक घंटे पहले शुरू हो जाता तो सफदर पर हमला नहीं होता. उस दिन अगर सफदर रंगकर्मियों को बचाने के लिए उनके और हमलावरों के बीच नहीं आते तो शायद उनका जीवन बच जाता मगर सफदर ने लड़ना सीखा था, भागना नहीं. कॉलेज के दिनों वे नक्‍सलवादी समूह से इसलिए दूर हुए क्‍योंकि वे बंदूक के दम पर न्‍याय की बात करते हैं जबकि सफदर तो जागृत कर न्‍याय पाने की बात करने वाले इंसान थे. आज वे न हो कर भी मजदूरों व कलाकारों की एकता के प्रतीक बने हुए हैं. वे कला के जन सरोकार के प्रतीक हैं. ऐसे सफदर के लिए बांग्‍ला कवि पुर्णेंदु पट्रिया की ये काव्‍य पंक्तियां एकदम मौजूं हैं:

जुल्म नया शब्द नहीं है,

उत्पीड़न और अन्याय

नई बात नहीं है

नया शब्द और नई बात है

सफदर हाशमी

सफदर हाशमी का मतलब

जागना होता है

जागते रहना, जगाना.

The grief of this death

Can never be lowered from our shoulders

How foolish barbarism is

As though death is enough to wipe out

The heart of a vow

Assault is not a new word

Violence is not a new word

The new word is Safdar Hashmi

Safdar Hashmi means waking up

Staying awake

Awakening

(“A New Word: Safdar Hashmi”, Purnendu Pattrea, translated from the Bengali)

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