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हाइलाइट्स
शरीर के लिए गलगल को रामबाण माना जाता है.
कच्चे गलगल को पूजा में शामिल किया जाता है.
Swad ka Safarnama: गलगल क्या है. अगर हम कहें कि यह नींबू का ‘बाप’ है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. यह असल में नींबू प्रजाति का ही एक फल है, लेकिन नींबू से गई गुणा बड़ा होता है और रस भी इसमें नींबू से कई गुणा अधिक पाया जाता है. इसे शरीर के लिए इसे बेहद लाभकारी माना जाता है. गलगल का गुणकारी रस हृदय की कार्यप्रणाली को सुचारू बनाए रखने में मददगार है. यह पाचन सिस्टम को भी मजबूत बनाए रखता है. गलगल का उत्पत्ति स्थल भारत माना जाता है और यह हजारों वर्षों से हिमालयी और आसपास के क्षेत्रों में फल-फूल रहा है.
शरबत, चटनी से लेकर अचार तक भी उपयोगी
गलगल (Hill lemon) एक गजब का और बेहद खट्टा फल है. नींबू से बहुत बड़ा गलगल रस से भरपूर होता है. काटकर निचोड़ेंगे तो भरभराकर रस गिरने लगेगा. कुछ चिकना, कुछ अनगढ़ सा गलगल पकने के बाद अपने पीले रूप में गजब तौर पर आकर्षित करता है. इसका स्वादिष्ट शरबत और चटनी तो बनती ही है, मुरब्बा और अचार भी बेहद पसंद किया जाता है. असल में इसका मोटा छिलका अचार में रंग और स्वाद भरता है. पहाड़ी इलाकों में जब सर्दियों के दौरान घरों में मेहमान आते हैं जो उन्हें थाली में गलगल के छोटे टुकड़े काटकर उसमें मसाले और हल्की सी चीनी डालकर बनाया गया विशेष आहार खिलाया जाता है. इस आहार को खिलाना मेहमान को सम्मान देना माना जाता है.
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पश्चिमी हिमालय में गलगल के पौधे को पवित्र माना जाता है. Image-Canva
गलगल की फसल मुख्य तौर पर अक्टूबर से जनवरी के बीच बहुतायत में फलती-फूलती है. उस वक्त इसके रस में थोड़ा सा सरसों का तेल और नमक डालकर उसे पकाकर स्टोर कर लिया जाता है. यह रस पूरे साल काम आता है.
हिमालय का तराई क्षेत्र है इसका उत्पत्ति स्थल
नींबू की कई प्रजातियां भारतीय मूल की हैं, उनमें गलगल भी शामिल है. यह हजारों वर्षों से भारत के पहाड़ी क्षेत्रों विशेषकर हिमालय के तराई क्षेत्रों में फल-फूल रहा है. यह उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में भी पैदा होता है. दुनियाभर के अधिकतर फलों की उत्पत्ति व विकास पर ‘Fruits’ नामक पुस्तक लिखने वाले भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (पूसा) के कृषि विज्ञानी प्रो़ रंजीत सिंह व प्रो़ एसके सक्सेना का मानना है कि गलगल की उत्पत्ति भारत में हुई है और इसका उत्पत्ति क्षेत्र हिमालय का तराई वाला इलाका है.
भारत में सातवीं-आठवीं ईसा पूर्व लिखे गए आयुर्वेदिक ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ में इस फल का वर्णन है. ग्रंथ के अनुसार यह वात व कफ नाशक है, भूख बढ़ाता है, सांसों की गति को सुचारू रखता है. पश्चिमी हिमालय में गलगल के पौधे को पवित्र माना जाता है और कच्चे गलगल पूजा में शामिल किया जाता है. सामाजिक व अन्य गृह कार्यों में इसकी पत्तियों का भी इस्तेमाल किया जाता है.
बॉडी में फैट को गलाने की है क्षमता
शरीर के लिए गलगल को रामबाण माना जाता है. फूड एक्सपर्ट तो इसे विशेष मानते ही है, आधुनिक आयुर्वेद चिकित्सा में भी इसे गुणी फल कहा गया है. भारतीय जड़ी-बूटियों. फलों व सब्जियों पर व्यापक रिसर्च करने वाले जाने-माने आयुर्वेद विशेषज्ञ आचार्य बालकिशन कहते हैं कि इस फल (नींबू जंबीरी) में औषधिय गुण हैं. यह विरेचक, कृमिनाशक, पूयरोधी (एंटीसेप्टिक) है. यह बदहजमी रोकता है, सांस की गतिविधियों को सामान्य रखता है, तो गठिया में भी लाभकारी है. विशेष बात यह है कि यह पहाड़ी फल हृदय को पीड़ा से दूर रखता है और कफ-पित्त-वात को रोकता है.
गलगल में विटामिन सी खूब है, इसलिए यह शरीर को एनीमिक होने से बचाता है. Image-Canva
फूड एक्सपर्ट व डायटिशियन अनिता लांबा के अनुसार गलगल में भरपूर विटामिन सी व पेक्टिन (घुलनशील) फाइबर होता है, जो इसे विशेष बनाता है. यही तत्व हार्ट को स्मूथ रखते हैं और उसे अटैक से भी बचाते हैं. गलगल के खट्टेपन में कुछ अलग प्रकार के तत्व पाए जाते हैं, यह तत्व हार्ट और धमनियों में फैट को जमने नहीं देते. उसे लगातार तोड़ते रहते हैं. जिस कारण हार्ट लंबे समय तक स्वस्थ बना रहता है.
किडनी को स्टोन से भी बचा लेता है फल
इस फल में पाए जाने वाले यह घुलनशील फाइबर और खट्टापन मोटापे को कंट्रोल करते हैं और अगर एक्सरसाइज के साथ गलगल का सेवन किया जाए तो यह वजन भी कम कर देता है, क्योंकि इसके खट्टेपन में फैट को गलाने की क्षमता है. इस फल में पोटेशियम भी पाया जाता है, जो हड्डियों को भी स्वस्थ रखता है. चूंकि इसमें विटामिन सी खूब है, इसलिए यह शरीर को एनीमिक होने से बचाता है. यह पेट को संक्रमित होने से भी रोकता है. ऐसा भी माना जाता है कि इसके सेवन से किडनी में स्टोन का दोष नहीं बन पाता है. एक रिपोर्ट यह भी बताती है कि इसके अर्क (रस) में एंटीऑक्सीडेंट व मधुमेह विरोधी गुण भी मौजूद हैं. गलगल का सहज रूप से सेवन किया जाए तो किसी प्रकार का साइड इफेक्ट नहीं है, लेकिन अधिक मात्रा में खाए जाने पर यह दांतों को बेहद खट्टा कर देगा, साथ ही पेट में मरोड़ भी पैदा कर सकता है.
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FIRST PUBLISHED : June 11, 2023, 06:59 IST
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