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यूक्रेन युद्ध (Ukraine War) के शुरू होने के एक साल बाद भी उसके खत्म होने की तो दूर उसे रोकने के लिए प्रयासों में भी गंभीरता दिखाई नहीं दे रही है. उपलब्धि के नाम पर हम केवल यही कह सकते हैं कि यह युद्ध यूक्रेन ( से बाहर तक नहीं फैला है. युद्ध की वजह से दुनिया में पहले ही कच्चे तेल, खाने के तेल और गेहूं की समस्याएं बढ़ गईं हैं. दुनिया का खाद्य संकट गहरा गया है. आने वाले समय में युद्ध और भीषण होने वाला है यह तय बताया जा रहा है. भारत के विदेश सेवा में लंबे समय तक काम कर चुके और रूसी मामलों के विशेष डीबी वेंकटेश वर्मा का कहना है कि दरअसल रूस यूक्रेन युद्ध पश्चिमी देशों (West) और रूस (Russia) के बीच हो रहा है और यूक्रेन केवल इसका मैदान भर है.
क्या बदला है एक साल में
आने वाले समय में जंग और तीखी होने निश्चित है क्योंकि धीरे धीरे पश्चिमी देशों का इसयुद्ध में योगदान और ज्यादा खुल कर सामने आन लगा है. मनीकंट्रोल को दिए इंटरव्यू में वर्मा ने बताया कि रूस ने इस दौरान काफी सबक लिए हैं और उन पर काम भी किया है, लेकिन यूक्रेन की स्थिति कमजोर नहीं तो मजबूत भी नहीं हुई है.
कौन मजबूत और कौन कमजोर
वर्मा के मुताबिक इस युद्ध में भले ही रूस यूक्रेन पर पूरी तरह हावी ना हुआ हो या उसे होने ना दिया गया हो और भले ही रूस यूक्रेन पर कब्जा करता नहीं दिख रहा हो, लेकिन अभी तो नुकसान में यूक्रेन ही ज्यादा है वहीं रूस नुकसान से उबर सकता है और उबर भी रहा है लेकिन यूक्रेन की पश्चिम पर निर्भरता बढ़ती जा रही है.
रूस बनाम अमेरिका ही?
शुरू में भले ही यह युद्ध रूस और यूक्रेन के बीच का विवाद लगता रहो हो, लेकिन सच यही है रूस शुरू से ही यूक्रेन अमेरिकी छद्म बलों से युद्ध कर रहा था. अब तो यह पूरी तरह से रूस- अमेरिकी छद्म युद्ध हो चुका है. युद्ध का मैदान यूक्रेन है. लेकिन इसके वैश्विक स्तर पर बहुत गहरे असर होंगे.और इसमें अमेरिकी की हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन के खिलाफ रणनीति पर काम करने की क्षमता भी प्रभावित होगी.
यह युद्ध रूस बनाम अमेरिका छद्म युद्ध (Russia-US Proxy War) में बदल गया है स्पष्ट होता जा रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)
हथियारों की आपूर्ति का मतलब
यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति का इजाफा एक बड़ा संकेत है. यह सिर्फ युद्ध को लंबा खींचने का ही काम करेगा जो किसी भी पक्ष के लिए अच्छी बात नहीं है. अभी कोई भी दूसरे के हितों के अपने हितों के साथ समायोजित करने के लिए तैयार नहीं है. कोई भी तब तक बातचीत के लिए तैयार नहीं होगा जब तक वह बहुत बेहतर स्थिति में ना आ जाए.
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बहुत गंभीर है अमेरिका
यहां एक बात गौर करने वाली यह भी है कि यूक्रेन में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का अचानक उपस्थिति ने दुनिया को बड़ा संदेश दिया है. बाइडेन ने यूक्रेन का मनोबल तो बढ़ाया ही है बल्कि अमेरिका में भी अपनी स्थिति को साफ विरोधियों को कड़ा संदेश देने का प्रयास किया है कि अमेरिका यूक्रेन मामले को लेकर बहुत ज्यादा गंभीर है.
हाल के समय में अमेरिका का यूक्रेन में दखल ज्यादा बढ़ा है जो अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन (Joe Biden) का यूक्रेन यात्रा से साफ नजर आता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Wikimedia Commons)
नाटो की भूमिका
इस मामले में यूरोप एक बड़ा पक्ष है, लेकिन वह यानि अधिकांश यूरोप नाटो के साथ बंधा हुआ है. हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि अब नाटो की भूमिका बहुत बड़ी नहीं रह जाएगी क्योंकि युद्ध जारी रखने पर अगर यूरोप में भी विवाद हुआ तो अमेरिका खुद आगे आकर नाटो को पीछे कर देगा जो कि होता भी दिख रहा है क्योंकि यह युद्ध अब अमेरिका की नाक का सवाल बनता जा रहा है और नाटो का नाम पीछे हो सकता है.
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भूराजनैतिक हालात बेशक बदल रहे हैं और अमेरिका के लिए भी एक बड़ी चुनौती है. उसे यूरोप को अपने साथ रखना होगा और दुनिया के बाकी देशों को भी यह समझाना होगा कि युद्ध उसकी विस्तारवादी नीति के लिए नहीं बल्कि विश्व व्यवस्था के लिए है. लेकिन सबसे बड़ी समस्या चीन को रोकने के प्रायसों से उसका ध्यान बंट रहा है जिसकी चीन को फायदा मिल सकता है. पर चीन खुद अपनी कई समस्याओं में उलझा हुआ है. वहीं भारत को भी अपने हितों के लिए बदलते हालातों पर पैनी नजर रखनी होगी.
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