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धारा 377 में 6 माह में संशोधन करे केंद्र सरकार- कर्नाटक हाई कोर्ट

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धारा 377 में 6 माह में संशोधन करे केंद्र सरकार- कर्नाटक हाई कोर्ट

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हाइलाइट्स

अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार मृत व्यक्ति की गरिमा को बनाए रखने का काम करे.
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कहा कि इसके लिए आईपीसी की धारा 377 में संशोधन किया जाए.
कहा-इस धारा के तहत लाशों और शवों के साथ हुए बलात्कार को भी शामिल किया जा सके.

बेंगलुरु: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से आईपीसी की धारा 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध के मामले में दंड प्रावधान) में 6 महीने के भीतर संशोधन करने के लिए कहा है, ताकि मृत व्यक्ति की गरिमा को बनाए रखने के लिए इस धारा के तहत लाशों और शवों के साथ हुए बलात्कार को भी शामिल किया जा सके.

न्यायामूर्ति बी वीरप्पा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने तुमाकुरू के एक शख्स पर लगे बलात्कार के आरोप से बरी करते हुए यह फैसला सुनाया. हालांकि अदालत ने उस पर लगे हत्या के आरोप में उसकी सजा बरकरार रखी है.

धारा 377 में मृत शरीर को भी शामिल किया जाए
पीठ ने 30 मई को पारित एक आदेश में उल्लेख किया, ‘अब वक्त आ गया है कि केंद्र सरकार मृत व्यक्ति के अधिकार की गरिमा को बनाये रखने के लिए आईपीसी की धारा 377 में संशोधन करते हुए इसमें मृत पुरुष, महिला या जानवर के शव को शामिल करे. या फिर इस पर एक अलग से कानूनी प्रावधान पेश किया जाए. न्यूजीलैंड, यूके, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में नेक्रोफीलिया (कोई व्यक्ति जो किसी शव के प्रति यौनाकर्षण रखता है) या सेडिज्म ( दूसरों को यातना देकर यौन सुख प्राप्त करना) पर प्रावधान पारित किया जा चुका है.’ प्रकृति के खिलाफ जाकर शारीरिक संबंध में आजीवन कारावास या 10 साल की अवधि तक कारवास के दंड का प्रावधान होना चाहिए, पीठ ने यह भी कहा कि इसके साथ ही दोषी पर जुर्माना भी लगाया जाना चाहिए.

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क्या था मामला
अदालत ने तुमकुरू जिले के रंगराजू उर्फ वाजपेयी के मामले पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की. रंगराजू पर 25 जून, 2015 को एक 21 साल की युवती के गले में हथियार घोंप कर हत्या करने और फिर शव के साथ बलात्कार करने का आरोप था. 9 अगस्त, 2017 को जिला एवं सत्र न्यायालय तुमकुरू ने रंगराजू को हत्या और बलात्कार का दोषी माना. 14 अगस्त को उसे हत्या के आरोप में आजावीन कारावास और 50000 रुपये जुर्माना और बलात्कार के आरोप में 10 साल की सजा और 25000 जुर्माना की सजा सुनाई गई.

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रंगराजू ने इस फैसले के खिलाफ अपील करते हुए कहा कि शिकायत एक हफ्ते की देरी से दर्ज हुई और वहां कोई चश्मदीद गवाह नहीं था, ना ही हत्या का कोई मकसद साफ हुआ. उसके हिसाब से आईपीसी की धारा 376 के तहत कोई आरोप नहीं बनता है और ट्रायल कोर्ट का उसे दोषी ठहराना उचित नहीं था.

उच्च न्यायालय ने क्यों किया आरोपी को बरी
उच्च न्यायालय ने कहा कि धारा 377 अप्राकृतिक यौन संबंध के बारे में बात करती है लेकिन इसमें शव को शामिल नहीं किया गया है. महिला के मृत शरीर के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने वाले व्यक्तियों को दंडित करने के लिए आईपीसी में कोई प्रावधान नहीं है. इसलिए यह मामला धारा 376 के तहत नहीं बनता है. पीठ ने कहा कि सत्र न्यायाधीश ने भौतिक पहलू पर विचार नहीं किया और आरोपी को धारा 376 के तहत गलत दोषी ठहराया है.

Tags: Amending the law, Central government, High Court Comment, Karnataka, Section 377

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