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महादेवी वर्मा एक जगह लिखती हैं, ‘विचारों के क्षणों में मुझे गद्य लिखना ही अच्छा लगता है, क्योंकि उसमें अपनी अनुभूति ही नहीं बाह्य परिस्थितियों के विश्लेषण के लिए भी पर्याप्त अवकाश रहता है.’ महादेवी वर्मा ने अपना पहला सामाजिक निबंध तब लिखा था, जब वह सातवीं कक्षा में पढ़ती थीं. ऐसे में उनकी रचनाओं को पुस्तक का रूप लेने तक, जीवन की वास्तविकता से उनका परिचय नया नहीं था. महादेवी वर्मा के चर्चित संग्रह ‘शृंखला की कड़ियां’ में ऐसे निबंधों को शामिल किया गया, जिसमें उन्होंने भारतीय नारी की विषम परिस्थितियों को अनेक दृष्टिबिंदुओं से देखने का प्रयास किया है. अन्याय के प्रति वह अपने स्वभाव से ही असहिष्णु थीं, ऐसे में इस संग्रह के निबंधों में उग्रता की गंध स्वाभाविक है, लेकिन ध्वंस के लिए ध्वंस के सिद्धांत में उनका कोई विश्वास नहीं था. वह लिखती हैं, “मैं तो सृजन के उन प्रकाश-तत्त्वों के प्रति निष्ठावान हूं जिनकी उपस्थिति में विकृति अंधकार के समान विलीन हो जाती है.”
गौरतलब है, कि महादेवी वर्मा का जन्म साल 1907 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था. उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई मिशन स्कूल इंदौर में हुई. 22 साल की उम्र में महादेवी वर्मा बौद्ध-दीक्षा लेकर भिक्षुणी बनना चाहती थीं, लेकिन महात्मा गांधी से मिलने के बाद अपना निर्णय बदल दिया और समाज सेवा में लग गईं. महादेवी वर्मा की पहचान एक उच्च कोटि की हिंदी कवयित्री, स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षा-शास्त्री, महिला एक्टिविस्ट और साहित्यकार के तौर पर की जाती है. अपने निबंध-संग्रह ‘शृंखला की कड़ियां’ के बारे में उन्होंने लिखा था, “इस संग्रह में प्रस्तुत निबंध किस सीमा तक सोचने की प्रेरणा दे सकेंगे, यह बता सकना मेरे लिए भी संभव नहीं. पर यदि इनसे भारतीय नारी की विषम परिस्थितियों की धुंधली रेखाएं कुछ स्पष्ट हो सकें तो इन्हें संग्रहीत करना व्यर्थ न होगा.” आइए पढ़ते हैं उनके चर्चित निबंध-संग्रह ‘शृंखला की कड़ियां’ के अंश…
जीवन का व्यवसाय : शृंखला की कड़ियां
आदिम युग से ही नारी ने पशुबल में अपने आपको पुरुष से दुर्बल पाया. प्रकृति ने न केवल उशके शरीर को ही अधिक सुकुमार बनाया है, वरन् उसे मनुष्य की जननी का पद देकर उसके हृदय में अधिक संवेदना, आंखों में अधिक आर्द्रता तथा स्वभाव में अधिक कोमलता भर दी. मातृत्व के कारण उसके जीवन का अधिक अंश संघर्ष से भरे विश्व के एक छिपे कोने में बीतता रहा. पुरुष चाहे उसे युद्ध में जीतकर लाया, चाहे अपहरण कर; चाहे उसकी इच्छा से उसे प्राप्त कर सका, चाहे अनिच्छा से; परंतु उसने प्रत्येक दशा में नारी को अपनी भावुकता का अर्घ्य देकर पूजा. नारी भी नारियल के कड़े छिलके के भीतर छिपे जल के समान पुरुष की बाह्य कठोरता के भीतर छिपी स्निग्ध प्रवृत्ति का पता पा गई थी. अत: उसने सारी शक्ति केवल उसकी कोमल भावना को जगाने में लगा दी. उसने न अपनी भुजाओं में शक्ति भरने और उस शक्ति के प्रदर्शन से पुरुष को चमत्कृत करने का प्रयत्न किया और न अपनी विद्याबुद्धि से पुरुष को पराजित करने का विचार किया. वह जानती थी कि इन गुणों के प्रदर्शन से पुरुष में प्रतिद्वंद्विता की भावना जागेगी, परंतु वह पराजित होने पर भी वशीभूत न हो सकेगा, क्योंकि प्रतिद्वंद्वियों की हार-जीत में किसी प्रकार का आत्म-समर्पण भी संभव नहीं.
इसी से आदिम युग की नारी ने निरर्थक प्रतिद्वंद्विता का भाव न रख कर अपने केशों में फूल उलझाए, कानों में कलियों के गुच्छे सजाए और संपूर्ण नारीत्व के बल पर उसने बर्बर पुरुष को चुनौती दी! उस युग का कठोर पुरुष भी कोमल नारीत्व के सम्मुख कुंठित हो उठा. तब से न जाने कितने युग आए और चले गए, कितने परिवर्तन पुराने होकर नए परिवर्तनों को स्थान दे गए, परंतु स्त्री तथा पुरुष के संबंधों में जो तब सत्य था वह अब भी सत्य है. स्त्री ने न शारीरिक बल से पुरुष को जीता और न ही विद्याबुद्धि से, फिर भी जय उसी की रही, क्योंकि पुरुष ने अपने नीरस जीवन को सरस बनाने के लिए उसकी मधुरता खोजी और उसका अधिक से अधिक मूल्य दिया.
परंतु नारी के कर्त्तव्य की चरम सीमा उसके प्रेयसी होने में ही समाप्त नहीं होती; उस पर मातृत्व का गुरु भाव भी है. धीरे-धीरे वह संतान की वात्सल्यमयी जननी बन कर, पुरुष को आकर्षित करने वाली रमणीसुलभ विशेषताओं को भूलने लगी. उसके स्त्रीत्व के विकास तथा व्यक्तित्व की पूर्णता के लिए संतान साध्य है और रमणीत्व साधन मात्र. इसीलिए प्रत्येक रमणी मातृत्व का अंकुर छिपाए हुए है. परंतु यह संशयात्मक है कि प्रत्येक पूर्ण माता रमणीत्व से शून्य नहीं.
वास्तव में माता होकर उसकी इच्छा, भावना तथा चेष्टा में ऐसा परिवर्तन हो जाता है, जो सूक्ष्म होकर भी स्पष्ट है और सीमित होकर भी जीवन भर में व्यापक है. जब स्त्री प्रेयसी से पत्नी तथा पत्नी से माता रूप में परिवर्तित हो गई तब उसके प्रति विशेष कर्त्तव्य के बंधन में बंधे हुए पुरुष ने देखा तथा अनुभव किया कि वह स्त्री से अधिक महान हो जाने- के कारण क्रीड़ा की वस्तु मात्र नहीं रह गई. पुरुष ने स्त्री के मातृ-रूप के सामने मस्तक झुकाया, उस पर हृदय की अतुल श्रद्धा चढ़ाई अवश्य, परंतु पूजा-अर्चा से उसके अंतस्तल की प्यास न बुझी. उसे ऐसी स्त्री की भी कामना रही, जो केवल मनोविनोद और क्रीड़ा के लिए होती, जो जीवन के आदि से अंत तक केवल प्रेयसी ही बनी रह सकती और जिसके प्रति पुरुष कर्त्तव्य के कठोर बंधन में न बंधा होता. पुरुष इसी इच्छा का परिणाम हमारे यहां की वार-वनिताएं हैं, जिन्हें जीवन भर केवल स्त्री और प्रेयसी ही बना रहना पड़ता है.
उनके जीवन का विकास एकांगी होता है. उनके हृदय की कल्याणमयी सुकोमल भावनाएं प्राय: सुप्त ही रहती हैं और उनकी जीवन-शक्ति प्रकाश देने तथा जगत् में उपयोगी कार्य करने वाली विद्युत न होकर ऐसी विद्युत होती है जिसका पतन वृक्षों के पतन का पूर्वगामी बन जाता है.
उसके मन तथा शरीर दोनों को नित्य नवीन बने रहने का अभिशाप मिला है. उनके नारीत्व को दूसरों के मनोरंजन मात्र का ध्येय मिला है तथा उनके जीवन का तितली जैसे कच्चे रंगों से शृंगार हुआ है, जिसमें मोहकता है परंतु स्थायित्व नहीं. वह संसार की विकृत प्राणी मानकर दूर रखी गई, परंतु विनोद के समय आवश्यक भी समझी गई, जैसे मनुष्य-समाज, हानि पहुंचाने वाले विचित्र पशु-पक्षियों को भी मनोरंजन के लिए कठघरे में सुरक्षित रखता है.
पुरुष ने ऐसी, केवल मनोरंजन के लिए जीवित रहने वाली, नारी के प्रेयसी भाव को और अधिक मधुर बनाने के लिए भावोद्दीपक कलाओं की आराधना का अधिकार दिया. ऐसे अस्त्रों से सुसज्जित होकर वह और भी दुर्जेय हो उठी. उसने फूल-जैसे हल्के चरणों से देवता के सामने तन्मयताभरा लास दिखाया, कोकिल से मीठे स्वरों में में बंधे संगीत से मानव समुदाय को बेसुध करना तथा पुरुष की दर्बल सुप्त प्रवृतियों को जगाने का अधिक से अधिक मूल्य मांगा और पाया. पुरुष ने उसे अपने कल्याण के लिए नहीं स्वीकार किया, वरन् बाह्य संसार के संघर्ष तथा शुष्कता से क्षण भर अवकाश पाने के लिए मदिरा के समान उसके साहचर्य का उपयोग किया. प्रश्न हो सकता है कि क्या स्त्री, पत्नी के रूप में पुरुष के संघर्षमय जीवन को अधिक सरल और सह्य न बना सकती थी? अवश्य ही बना सकती थी और बनाती रही है; परंतु वह माता होकर जो स्निग्ध स्नेह दे सकती है वह उत्तेजक नहीं है और प्राय: पुरुष ऐसी उत्तेजना भी चाहता है, जिससे वह कुछ क्षणों के लिए संज्ञाशून्य-सा हो जावे.
गंगाजल मदिरा से अधिक कल्याणकारक तथा पवित्र है, परंतु कोई भी अपने आपको भूलने की इच्छा रखने वाला उसकी पवित्रता पर ध्यान न देगा. स्त्री, पत्नी बनकर पुरुष को वह नहीं दे सकती जो उसकी पशुता का भोजन है. इसी पे पुरुष ने कुछ सौंदर्य की प्रतिमाओं को पत्नीत्व तथा मातृत्व से निर्वासित कर दिया. वह स्वर्ग में अप्सरा बनी और पृथ्वी पर वीरांगना. राजकार्य से ऊबे हुए भूपालों की सभाएं उससे सुसज्जित हुईं, युद्ध में प्राण देने जाने वाले वीनों ने तलवारों की झनझनाहट सुनने से पहले उसके नूपुरों की रुनझुन सुनी, अति विश्राम से शिथिल लक्ष्मी के कृपा-पात्रों के प्राण उसकी स्वरलहरी के कंपन से कंपित हुए और कर्त्तव्य के दृढ़ बंधन में बंधी गृहिणी उसके अक्षय व्यावसायिक स्त्रीत्व के आकर्षण से सशंकित हो उठी. आंखी के समान उसका स्त्रीत्व बादल की छवि लेकर आया, परंतु ध्वंस तथा धूल छोड़कर अज्ञात दिशा में बढ़ गया.
पुरुष के लिए वह आदिम युग की बंधनहीन, कर्त्तव्य-ज्ञान-शून्य तथा समाजरहित नारीमात्र रही. पुरुष को आकर्षित करना उसका ध्येय तथा पराभूत करना उसकी कामना रही. मनुष्य में जो एक पशुता का, बर्बरता का अक्षय अंश है उसने सर्वदा ऐसी ही नारी की इच्छा की. इसी से ऐसी रूप-व्यवसायिनी स्त्री की उपस्थिति सब युगों में संभव रही. स्त्री के विकास या उसकी शक्तियों के विस्तार के लिए ऐसा जीवन कितना आवश्यक या उपयुक्त है, इस पर पुरुष ने प्राय: विचार नहीं किया. विचार करने की उसे आवश्यकता भी नहीं थी. उसके पास त्याग, बलिदान तथा आत्मसमर्पण का मर्म जानने वाली एक पत्नी थी ही. माता और बहिन के स्नेह से भी उसके प्राण स्निग्ध थे. फिर वह इस रूप की हाट में उत्तेजना बेचने वाली कलामयी नारी के हृदय की भूख क्योंकर समझता? उसे भी अपनी पूर्णता के लिए सौंदर्य के विक्रय के अतिरिक्त और कुछ चाहिए, यह कैसे मान लेता? यदि यह रूपसी भी माता बनकर वात्सल्य का वितरण करने लगती तो फिर पुरुष नारी का केवल प्रेयसी रूप कहां और किसमें देखता, उत्तेजना की मदिरा कहां और कैसे पाता?
उसने कहीं इस स्त्री को देवता की दासी बनाकर पवित्रता का स्वांग भरा, कहीं मंदिर में नृत्य कराकर कला की दुहाई दी और कहीं केवल अपने मनोविनोद की वस्तु-मात्र बनाकर अपने विचार में गुण-ग्राहकता ही दिखाई.
यदि स्त्री की ओर देखा जाए तो निश्चय ही देखनेवाला कांप उठेगा. उसके हृदय में प्यास है, परंतु उसे भाग्य ने म-गमरीचिका में निर्वासित कर दिया है. उसे जीवन भर आदि से अंत तक सौंदर्य की हाट लगानी पड़ी, अपने हृदय की समस्त कोमल भावनाओं को कुचलकर, आत्मसमर्पण की सारी इच्छाओं का गला घोंटकर, रू का क्रय-विक्रय करना पड़ा– और परिणाम में उसके हाथ आया निराश हताश एकाकी अंत.
उसने क्या खोया और क्या पाया, इसका विचार करने का संसार ने उसे अवकाश ही न दिया और यदि देता भी तो संभव है वह तब अपना हानि-लाभ जानने की बुद्धि नहीं रखती. जीवन की एक विशेष अवस्था तक संसार उसे चाटुकारी से मुग्ध करता रहा है, झूठी प्रशंसा की मदिरा से उन्मत्त करता रहा है, उसके सौंदर्य-दीप पर शलभ-सा मंडराता रहता है परंतु उस, मादकता के अंत में, उस बाढ़ के उतर जाने पर उसकी ओर कोई सहानुभूति भरे नेत्र भी नहीं उठाता. उस समय उसका तिरस्कृत स्त्रीत्व, लोलुपों के द्वारा प्रशंसित रूप-वैभव का भग्नावशेष क्या उसके हृदय को किसी प्रकार की सांत्वना भी दे सकता है? जिन परिस्थियों ने उसका गृह-जीवन से बहिष्कार किया, जिन व्यक्तियों ने उसके काले भविष्य को सुनहले स्वप्नों से ढांका, जिन पुरुषों ने उसके नुपुरों की रुनझुन के साथ अपने हृदय के स्वर मिलाए और जिस समाज ने उसे इस प्रकार हाट लगाने के लिए विवश तथा उत्साहित किया, वे सब क्या कभी उसके एकाकी अनत का भार कम करने लौट सके?
यह संभव नहीं था कि उसने अपने सुनहरे दिनों के साथियों पर विश्वास न किया हो, उनके प्रत्येक वाक्य में सच्ची सदिच्छा न देखी हो, परंतु उसके वे अनुभव अंत में मिथ्या ही निकलते हैं.
किसी भी विषय को सदा भावुकता के दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं होता. इन स्त्रियों की स्थिति को भी हम केवल इसी दृष्टिकोण से देखकर न समझ सकेंगे. उनकी स्थिति को यथार्थ रूप में देखने के लिए हमें उसे कुछ व्यावहारिक रूप में भी देखना होगा. अनेक व्यक्तियों का मत है कि चाहे जितना प्रयत्न किया जाए, स्त्री-समुदाय में कुछ स्त्रियां अवश्य ही ऐसी होंगी जो गृहस्थ जीवन तथा मातृत्व की अपेक्षा ऐसा स्वतंत्र जीवन ही स्वीकार करेंगी तथा कुछ-कुछ का मत है कि अनेक पुरुषों को ऐसी रूप की हाट की आवश्यकता भी रहेगी. पुरुष को आवश्यकता रहेगी, इसलिए स्त्री को अपना जीवन बेचना होगा, यह कहना न्यायसंगत न होगा. कोई भी सामाजिक प्राणी अपनी आवश्यकता के लिए किसी अन्य के स्वार्थ की हत्या नहीं कर सकता.
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Tags: Book, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature, Mahadevi Verma
FIRST PUBLISHED : July 06, 2023, 23:30 IST
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