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1857 की क्रांति का उद्गम स्थल माने जाने वाले मेरठ के जर्रे-जर्रे में इतिहास समाया हुआ है। रामायण और महाभारत काल से लेकर मुगलकाल तक की कई ऐतिहासिक धरोहरों का ये जिला साक्षी है। यहां हस्तिनापुर है तो रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका भी है। यहां बेगम समरू का ऐतिहासिक मकबरा है तो शाही ईदगाह जैसी नायाब इमारत भी हैं। शाही ईदगाह की बात करें तो पूरे उत्तर भारत में दूसरी ऐसी ईदगाह नहीं है, जहां ईटों पर आयतें लिखी हों, वह भी अरबी भाषा में।
बिना बुनियाद के खड़ी है शाही इमारत
मेरठ में दिल्ली रोड स्थित शाही ईदगाह करीब 832 साल पुरानी है। इसका निर्माण 1191 ईसवीं में दिल्ली के बादशाह कुतबुद्दीन ऐबक ने कराया था। शाही ईदगाह इतनी विशाल है कि इसके भीतर 136 सफें एक साथ बिछाई जाती हैं। जिसमें करीब 50 हजार अकीदतमंद एक साथ नमाज अदा कर सकते हैं। ईदगाह की एक और खासियत है कि इसका निर्माण बिना बुनियाद के किया गया है। यानि जमीन के भीतर इसकी कोई बुनियाद नहीं रखी गई। ईदगाह के निर्माण में मिट्टी और चूने के मिश्रण का प्रयोग किया गया। पूरी ईदगाह मिट्टी की चिनाई से बनाई गई है।
बादशाह घोड़े पर दिल्ली से नमाज पढ़ने आता था
शाही ईदगाह के सेक्रेटरी सलमान सब्जवारी बताते हैं कि बादशाह कुतबुद्दीन ऐबक ईद की नमाज पढ़ने कई बार मेरठ की शाही ईदगाह आए थे। जानकारों के अनुसार बादशाह घोडे़ पर दिल्ली से नमाज पढ़ने आते थे। उसके साथ पूरा लावलश्कर होता था। नमाज पढ़ने के बाद यहां पर बड़ी-बड़ी ढेंग चढ़ाई जाती थी। उसमें गरीबों के लिए भोजन बनाया जाता था, जो शहर और आसपास के क्षेत्रों में बांटा जाता था।
एक-एक शब्द अलग-अलग फरमे में ढाला गया
इस शाही ईदगाह के निर्माण में जिन ईटों का प्रयोग किया गया है, उनमें अरबी में आयतें लिखी है। एक-एक शब्द को अलग-अलग फरमे में ढालकर उसे अच्छी तरह से पकाकर उसे जोड़कर बनाया गया। ईदगाह को ऊपर देखने पर पता चलता है कि इसकी शुरुआत कुरान के पहले शब्द बिसमिल्लाहउर्रहमानउर्रहीम से की गई। इतिहासकार डॉ. अमित पाठक, डॉ. केके शर्मा, डॉ. मनोज गौतम का कहना है कि पूरे हिन्दुस्तान में जितनी भी ईदगाह हैं, उनमें अगर किसी में ईंटों पर इबारत लिखी हुई है तो वह सिर्फ मेरठ की शाही ईदगाह में ही है।
धरोहर को सहजने के किए जा रहे प्रयास
इस ऐतिहासिक इमारत और इसकी मुगलकालीन निशानियों को सहेजने की कोशिशें की जा रही हैं। सलमान सब्जवारी, कारी अफ्फान कासमी कहते हैं कि शाही ईदगाह की अरबी भाषा में आयतें लिखी ईटों को सहेजने के लिए तमाम कोशिशें हो रही हैं।
166 फटी लंबी और 42 फीट ऊंची है इमारत
शाही ईदगाह फन-ए-तामीर के ऐतबार से इसलिए भी अहम है, क्योंकि ये 166 फीट लंबी तथा 42 फीट ऊंची है। प्रख्यात सर्वेयर मिस्टर फ्रीमैन 1901 के आसपास मेरठ आए थे और शाही ईदगाह का स्केली नक्शा तैयार किया था। इस नक्शे पर अंतिम मुगल सम्राट और कैलियोग्राफी के उस्ताद बहादुर शाह जफर के शार्गिद के बेटे ने फारसी में इबारत लिखी और इस दौरान के आर्टिस्ट ने शाही ईदगाह का नक्शा खींचा।
कुतुब मीनार में पत्थरों पर खुदी हैं आयतें
मेरठ में शहीद स्मारक के संग्रहालय के अध्यक्ष रहे डॉक्टर मनोज गौतम ने शाही ईदगाह को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक स्मारकों के अध्ययन में शामिल किया था। इतिहासकार डॉ. मनोज गौतम कहते है कि इस तरह की आयतें कुतुब मीनार के कुतुब-उल-इस्लाम में मिलती हैं, लेकिन उसमें आयतें पत्थर पर खुदी हुई हैं।
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