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लोकतंत्र को सिर्फ चुनावी चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यदि संसद और सरकार की ओर से लिए गए सारे फैसले लोकतांत्रिक ही हों तो फिर अदालतों की तो कोई जरूरत ही नहीं रह जाएगी। चीफ जस्टिस ने यह बात कही।
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