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विश्व भर में हिंदी की अलख जगा रहे केंद्रीय हिंदी संस्थान के कर्मचारी और अधिकारी भारतीय नहीं हैं। ऐसा खुद आगरा के हिंदी संस्थान ने एक आरटीआई के जवाब में कहा है। संस्थान के कुलसचिव, उपाध्यक्ष, निजी सलाहकार और ऑडिटर के संबध में सूचना मांगी गई थी। इसका जबाव संस्थान ने ऐसा दिया है कि कोई भी चौंक जाए। क्योंकि संस्थान ने कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम भारतीय गणराज्य ने नागरिकों पर लागू होता है।
वरिष्ठ भाजपा नेता प्रमोद गुप्ता एडवोकेट के द्वारा केंद्रीय हिंदी संस्थान से पांच बिंदुओं पर सूचना मांगी गई थी। इसके जवाब में केंद्रीय हिंदी संस्थान की कुल सचिव और सहायक केंद्रीय जन सूचना अधिकारी डॉ. मुनिशा पाराशर की ओर से जवाब दिया गया। संस्थान की ओर से दिए गए जवाब में कहा गया है कि उपर्युक्त विषय एवं संदर्भ के संबंध में सूचित करना है कि सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 भारत गणराज्य के नागरिकों पर ही लागू होता है। अत आपका प्रेषित पोस्ट ऑर्डर मूल रूप में पत्र के साथ वापस भेजा जा रहा है। इस मामले पर संस्थान के निदेशक प्रोफेसर कुलकर्णी का कहना है कि मामले की जांच कराई जा रही है। इसके बाद ही स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
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इन बिंदुओं पर मांगी गई थी सूचना
– निदेशक के प्रशासनिक अधिकारी और निदेशक के निजी सलाहकार के पदों को संस्थान की कि बैठक में और कब स्वीकृत करने के लिए प्रस्ताव रखा गया था।
– संस्थान द्वारा ऑडिटर का पद कब विज्ञापित किया गया और उक्त विज्ञापन के संबंध में कितने और किन-किन के आवेदन प्राप्त हुए। छानबीन कमेटी के सदस्य कौन-कौन थे।
– संस्थान की कुलसचिव ने निलंबन की अवधि में कितनी बार और कहां-कहां अपना मुख्यालय छोड़ा। कुलसचिव के खिलाफ कितनी जांच विचाराधीन है। कितने मामले कोर्ट में लंबित है। इनके खिलाफ चल रही विभिन्न प्रकरणों को आवश्यक कार्रवाई हेतु कब बैठक में रखा जाएगा।
– संस्थान के प्रशासन विभाग में एक महिला कर्मी की नियुक्ति की गई। इसके लिए संस्थान द्वारा विज्ञापन कब जारी किया गया था।
– केंद्रीय हिंदी संस्थान के वर्तमान उपाध्यक्ष का मनोनयन कब किया गया। उपाध्यक्ष के रूप में कार्यभार ग्रहण करने के बाद से अब तक इनके द्वारा प्रयोग किए गए, वाहनों जलपान आदि पर कुल कितना खर्च किया गया।
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