Home Life Style सरस्‍वती मिश्र: रामदरश मिश्र की पत्‍नी ही नहीं, साहित्‍य सहचर भी

सरस्‍वती मिश्र: रामदरश मिश्र की पत्‍नी ही नहीं, साहित्‍य सहचर भी

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सरस्‍वती मिश्र: रामदरश मिश्र की पत्‍नी ही नहीं, साहित्‍य सहचर भी

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गत 3 दिसंबर, रविवार को जाने-माने कथाकार कवि रामदरश मिश्र की धर्मपत्‍नी सरस्‍वती नहीं रहीं. अपने वैवाहिक जीवन के 75 बसंत देख चुकीं सरस्‍वती जी के जाने से जैसे यह युगल मूर्ति अकेली रह गई. कभी रामदरश मिश्र ने लिखा था: “एक एक जा रहे सभी मन बड़ा अकेला लगता है.” यह तो उन्होंने अपने लेखक मित्रों, संगी-साथियों पर लिखा था कि कैसे उनके साथ घूमने टहलने वाले मित्र एक-एक कर चले गए. आज सरस्‍वती जी के जाने से वे फिर अकेले हो गये. अभी हाल ही कुछ महीनों तक वे स्‍वस्‍थ थीं, कोई लेखक आए, तत्‍काल आवभगत फिर चुपके से आकर बैठ जातीं. बातचीत में अपनी आवाज भी मिलातीं और रामदरश जी को पंडित जी कह कर संबोधित करतीं तो उनके भीतर की तरलता का अहसास होता. उनका यह संगसाथ पचहत्‍तर वर्षों का संग साथ रहा है. इसी साल जब फरवरी में रामदरश मिश्र जी के कूल्‍हे में फ्रैक्‍चर हुआ तो वे कितना व्‍यग्र हो उठी थीं. रामदरश जी नई दिल्ली के उत्‍तम नगर वाले मकान में गिर गए थे. 99 वर्ष की उम्र में कैसे हो फ्रैक्‍चर का ऑपरेशन, लेकिन आकाश हास्‍पिटल के आर्थेापेडिक सर्जन ने उनका सफल आपरेशन किया. दूसरे ही दिन रामदरश जी बिस्‍तर पर पड़े हुए बेटी स्‍मिता के कहने पर यह कविता दुहरा रहे थे-
”कुछ फूल और कांटे
हमने आपस में बॉंटे
यात्रा के हर मोड़े पर हमने
एक दूसरे का इंतजार किया है
हॉं हमने प्‍यार किया है.”

15 जुलाई, 2023 को वरदान गोल्‍ड द्वारका में आयोजित इस अनुष्‍ठान में कितने ही लेखक कवि मित्र दोस्‍त पधारे थे. यह विरल उत्‍सव की वेला थी. पचहत्‍तर साल का उनका दाम्‍पत्‍य था जितनी लोगों की उम्र नहीं होती. यह ईश्‍वर का वरदान ही था. किन्‍तु जुलाई, 2023 के बाद से ही सरस्‍वती जी अस्‍वस्‍थ हुईं तथा शरीर और मन शिथिल होता गया.

इस वर्ष 15 अगस्‍त को जब रामदरश मिश्र दी द्वारका के ब्रहमा अपार्टमेंट में अपने जीवन का शताब्‍दी समारोह मना रहे थे. सरस्वती जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं था, किन्‍तु समारोह में आईं और कुछ देर बैठीं. बोलने में असमर्थ होते हुए भी वे भीतर से बहुत खुश नजर आती थीं किन्‍तु यह शैथिल्‍य धीरे-धीरे बढ़ता गया. अभी हाल तक वे किसी लेखक कवि या रामदरश जी के पारिवारिक मित्रों के आने पर वे हुलस कर आ कर बैठ जाती थीं. पर लगभग दो महीने से यह सिलसिला भी खत्‍म सा हो गया था और 3 दिसंबर को वे अपनी अनंत यात्रा पर निकल गई.

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रामदरश मिश्र जी के जीवन के सरस्वती जी का बहुत महत्‍व था. रामदरश जी ने अनेक साक्षात्कारों में उन पर बातें की हैं. जब जब लोग उनसे उनके प्रेम के बारे में पूछते, वे सरस्‍वती जी से अपने ब्‍याह और परिचय की कथा कह सुनाते. रामदरश जी का उनसे यह दूसरा विवाह था, पहली पत्‍नी के निधन के बाद. पर यह विवाह प्रेम और परिणय की दृष्‍टि से ऐसा प्रतिफलित हुआ कि यह सुखद दाम्‍पत्‍य की मिसाल बन गया है. जब-जब कोई लेखिका रामदरश मिश्र से मिलने आती उसे सरस्‍वती जी अपने अंकवार में भर लेतीं. एक दुर्लभ किस्‍म की ममता से वे आपूरित थीं. गांव-जंवार लेखक समुदाय की जाने कितनी कहानियां उनके भीतर समाई हुई थीं. बनारस, गुजरात और फिर 1964 में दिल्‍ली आ जाने पर मॉडल टाउन में रहते हुए कितने ही लेखकों की उनके यहां आवाजाही रही पर जो मूर्ति उनके मन में बनारस रहते हुए आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और उनके परिवार की बनी उसकी तो बात ही और है. रामदरश मिश्र हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनन्‍य शिष्‍य थे. पर द्विवेदी जी मिश्र जी से परिवार के सदस्‍य जैसा स्‍नेह रखते. उनके घर में रामदरश और सरस्‍वती जी की नियमित आवाजाही थी. अनेक किस्‍से वे लोगों से सुनाती थीं हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के और उनके परिवार के.

साहित्‍यिक जीवन से जगमग दुनिया में सरस्‍वती मिश्र
साहित्‍य की दुनिया को जितना रामदरश मिश्र ने देखा है, उससे कम सरस्‍वती जी ने नहीं. घर आए और आते रहने वाले हर लेखक को वे आतिथ्‍य पूर्वक बिठाती थीं. मॉडल टाउन के दिनों में तो उनका घर छोड़ कर जब लोग दूसरे लेखकों के यहां बैठकी जमा कर लौट जाते तो उसे भी वे याद रखती थीं और कभी मौका मिलने पर इस बात की शिकायत करती थीं. किन्‍तु उनका हृदय भी रामदरश मिश्र की ही तरह विशाल था. उन्‍हें अपने बड़प्‍पन का अहसास था. लोग आज स्‍त्री विमर्श के नाम पर पुरुषों का प्रतिलोम खड़ा करते फिरते हैं, रामदरश मिश्र और सरस्‍वती के जीवन में कभी शायद ही टुन्‍न-पुन्‍न हुई हो. वे उनका लिखी हर रचना चाव से पढ़तीं और सुझाव देती थीं. उनके लेखन से वे खुश महसूस करतीं. भले ही वे खुद नहीं लिखती थीं किन्‍तु रामदरश जी के हर पात्र से उनकी भी वाकफियत थीं. अनेक कहानियों व उपन्‍यासों की कहानी सुझाने में उनका योगदान रहा है. ‘पानी के प्राचीर’, ‘जल टूटता हुआ’ तो आंचलिकता की लीक पर लिखे गए उपन्‍यास हैं, दूसरा घर के जीवन को सरस्‍वती जी ने भी बच्‍चों के साथ गुजरात में रहते हुए जिया है. सन् 1980 में जब वे उत्‍तम नगर के वाणी विहार रहने के लिए आए. कालोनी नई-नई बन रही थी जिसके अगुआ सुधाकर शुक्‍ल थे तो उन दिनों रामदरश जी का एक छोटा-सा उपन्‍यास आया था- ‘बिना दरवाजे का मकान’. नौकरानी दीपा के संघर्ष की कहानी है यह, लेकिन सच्‍ची कथा तो सरस्‍वती जी की बताई हुई है. यह जितनी दीपा की कहानी है उतनी ही तथाकथित मध्‍यवर्गीय परिवारों की पोल-पट्टी खोलने वाली कहानी भी है.

सरस्‍वती मिश्र ने जीवन भर रामदरश मिश्र को दुकान-दौरी, घर-गिरस्‍थी से दूर रखा. यह उनकी अपनी दुनिया थी जिसमें बिना कहे ही दोनों लोगों ने अपने-अपने काम का बँटवारा कर लिया था. यह काम बहुत सहज नहीं था पर सरस्‍वती जी ने अपनी कुशलता से इस सबकों साध लिया था. पांच-पांच बच्‍चों का पालन-पोषण, पढ़ाई-लिखाई, मिश्र जी की सेवा -सुश्रुषा और समानता के स्‍तर पर एक बौद्धिक सहचर का जीवन जीते हुए वे परम प्रसन्‍न नजर जाती थीं. घर में रह कर उन्‍होंने आगे की पढ़ाई भी पूरी की. किसी ने पूछा भी होगा कि क्‍या कोई चोरी-चुपके रामदरश जी के जीवन में कभी आया होगा, तो वे हॅंस कर जवाब देतीं, ऐसा संभव ही नहीं था, दूसरे पंडित जी भी ऐसे नहीं हैं. दोनों ने एक दूसरे के विश्‍वास को इसी तरह जिया. रामदरश मिश्र की कविताओं में औरतों पर भी जो कविताएं लिखी गई हैं उनमें कहीं न कहीं सरस्‍वती मिश्र की छाया नजर आती है.

एक बचपन यह भीः सरस्‍वती आधारित उपन्‍यास
‘एक बचपन यह भी’ सरस्‍वती मिश्र की ही कहानी है जिसे रामदरश मिश्र ने उपन्‍यास के कथाबंध में बांध दिया है. थकी हुई सुबह के बाद रामदरश मिश्र ने अचानक जो उपन्‍यास लिखे उनमें ज्‍यादातार छोटे फलक के ही उपन्‍यास हैं. ‘बीस बरस’, ‘परिवार’, ‘बचपन भास्‍कर का’ और ‘एक बचपन यह भी’. रामदरश मिश्र अपने उत्‍तर जीवन में उपन्‍यासों में अपनी छाया रचते नजर आते हैं. कहीं वे पत्रकार हैं तो कहीं वे पिता, कहीं पति और सहचर. इसी भाव से उन्‍होंने अपने उत्‍तर जीवन को रचा और सिरजा है. ‘एक बचपन यह भी’ उपन्‍यास में सरस्वती जी ‘चेतना’ (उपन्यास की नायिका) के रूप में हैं तो रामदरश जी ‘प्रसून’ (उपन्यास के नायक) के रूप में. वे प्रारंभ से ही चेतना के जन्‍म की कथा कहते हैं. पूर्व कथन में वे लिखते हैं कि कैसे वे जीवन भर पति प्रसून की मित्र बनी रहीं. उनके हिस्‍से का काम भी अपने खाते में डालती रहीं. उन्‍हें लिखने-पढ़ने के लिए स्‍वतंत्र छोड़ दिया था. पैसे के अभाव में भी वे सुचारु रूप से गृहस्‍थी चलाती रहीं. वे कृतज्ञता महसूस करते हैं कि अपने बलबूते दिल्‍ली जैसे शहर में उन्‍होंने अस्‍सी के आसपास ही मकान खड़ा कर लिया. पास-पड़ोस से वह रब्‍त-जब्‍त कि वे प्रसून से ज्‍यादा ख्‍यात हैं. वे याद करते हैं कि कैसे 84 के दंगे में सरस्वती जी सिख परिवारों को बचाने के लिए आगे आईं और फौज के सिपाहियों के रोकने के बावजूद अनेक सिख परिवारों को घरों से निकालकर सुरक्षित जगह पर पहुंचाया. पढ़ने की ललक ऐसी की गृहिणी होते हुए भी शादी के बाद उन्‍होंने इंटर, बीए और एमए किया. पीएचडी कर रही थीं पर वह बीच में ही प्रसून के कहने से रुक गईं. पर वे सचमुच चेतना संपन्‍न थीं तभी तो लेखक ने उनके ऊपर लिखे उपन्‍यास की नायिका का नाम चेतना रखा.

इस उपन्‍यास में चेतना के बचपन की कहानी है तो लड़की होने पर भी परिवार में तेजस्‍वी होने की आभा से युक्‍त नजर आती हैं. चेतना को शुरू से ही कविता के प्रति अनुराग था. पाठ्यक्रम की सभी कविताएं याद रहतीं. चेतना के हॅंसमुख वार्तालाप से कहानी आगे बढ़ती है और उस बिन्‍दु पर आ कर ठहर जाती है कि अब वे 16 साल की होने को आईं. सो विवाह होना चाहिए. सुमित्रा और वीरेश्‍वर इसके लिए चिंतित हो उठते हैं कि आखिर प्रसून से विवाह की बात चली. पहले शादी से मना करने वाली चेतना को भी जब पता चला कि लड़का कवि है तो मन में शादी की कल्‍पना तैरने लगी. पर लड़का दुहाजू था यह सोच कर कुछ असमंजस भी था परिवार में. सुमित्रा कहतीं कि आप दूसरा लड़का खोजिए, मैं जानबूझ कर अपनी बेटी को कुंए में नहीं डालूंगी. पर वीरेश्‍वर ने मन ही मन ठान लिया था कि शादी प्रसून से ही करनी है. इस तरह चेतना का विवाह प्रसून के साथ हुआ. चेतना की चंचलता से साथ नहीं छोड़ा. वह बचपन कुछ ससुराल में भी कुलांचे भरता रहा. अपनी इस प्रेम कहानी को रामदरश मिश्र ने बहुत ही धीरज से बयान किया है. अपने को एक पात्र में बदल कर सरस्‍वती और अपनी कथा कही है. यह है उनका दाम्‍पत्‍य प्रेम.

सरस्वती मिश्र पर रामदरश मिश्र के संस्‍मरण
यही नहीं ‘सर्जना ही बड़ा सत्‍य है’ नामक संस्‍मरणों की पुस्‍तक में रामदरश मिश्र ने मां के साथ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, नगेंद्र, भीष्‍म साहनी, शिवानी, नामवर सिंह, उमाशंकर जोशी और अशोक च्रक्रधर आदि के साथ-साथ अपनी हमसफर सरस्‍वती मिश्र के संस्‍मरण भी टॉंके हैं. वे लिखते हैं- “विवाह के पूर्व मैंने प्रेम कविताएं लिखी थीं पर उनका कोई ठोस आलंबन न था. विवाह के बाद उसे ठोस आलंबन मिल गया और प्रेम कविताओं में अनुभूति सघनता आने लगी.”

‘पथ के गीत’ में ऐसे अनेक प्रेम गीत हैं जिससे लगता है कि रामदरश जी ऐसे ही आलंबन को अपने गीतों में ढाल कर प्रसन्‍न होते रहे हैं. 1948 में रामदरश मिश्र सरस्‍वती जी के साथ विवाह बंधन में बंधे थे जब वे इंटर कर रहे थे. बनारस उन्‍हें लेकर आए तो कुछ दिन सिगरा में रहे. सुनसान इलाका लेकिन सरस्‍वती जी उतनी ही निर्भीक. पीएचडी करते हुए अनियमित मिलती स्‍कॉलरशिप के पैसे से गृहस्‍थी धीरे-धीरे खिसक रही थी. साहित्‍यिक सोहबतें धीरे-धीरे सघन हो रही थीं. ठाकुर प्रसाद सिंह नियमित मुलाकातियों में थे. उस वक्‍त के अनेक साहित्‍यकार उनके घर आते. कभी-कभी सरस्‍वती जी गुरुदेव हजारीप्रसाद द्विवेदी के घर चली जातीं. सरस्‍वती जी द्विवेदी जी के किस्‍से सुनाती थीं कि कैसे वे सुबह उठ कर चाय बनाते और पत्‍नी से कहते लो पुतुल की मां चाय पी लो. यह सुन कर रामदरश जी कहते यह मुझे क्‍यों सुना रही हो क्‍या तुम भी तो नहीं चाहती कि पंडित जी की तरह ही मैं तुम्‍हें सुबह चाय बना कर दिया करूं! तो ऐसी चुहल उनके बीच बनी रहती. पीएचडी पूरी हुई तो रामदरश जी की नौकरी की खोज जारी हुई.

बनारस, बड़ौदा, अहमदाबाद, दिल्‍ली में गुजरा जीवन
सन् 1956 में शोध जमा करने के बाद रामदरश मिश्र को बड़ौदा विश्‍वविद्यालय में नौकरी मिली तो कुछ दिनों में सरस्‍वती भी बड़ौदा पहुंचीं. साल भर बाद रामदरश मिश्र अहमदाबाद जेबियर कॉलेज आ गए. अहमदाबाद कुछ दिन तो अजनबी लगा पर बाद में रघुवीर चौधरी, भोला भाई पटेल, महावीर सिंह चौहान, भंवर लाल गुर्जर आदि आत्‍मीय सदस्‍य उनके परिवार का अंग बनते गए. 1964 में दिल्‍ली आते हुए उन्‍हें बहुत दुख हुआ क्‍योंकि सरस्‍वती जी वहां के लोगों में रच बस गयी थीं.

सरस्‍वती मिश्र सच को सच कहना जानती थीं. अनेक साहित्‍यकारों को यह बात पता थी. नामवर सिंह को उनके मुंह पर भी खरी-खोटी सुना दिया करती थीं. दिल्‍ली आने पर कुछ दिन मॉडल टाउन में गुजारे. बाद में 1980 के आसपास उत्‍तम नगर आ बसे जहां बिल्‍कुल सन्‍नाटा था. खेत ही खेत दिखते थे. पर दिल्‍ली में अपना घर हो, यह सरस्‍वती जी का ही आग्रह था लिहाजा इस सन्‍नाटे-सुनसान में भी उन्‍होंने ही अपने बलबूते लोहा, सीमेंट, गिट्टी, ईंट आदि जुटा कर घर बनवाया.

सरस्वती की बदौलत बड़े लेखक
रामदरश मिश्र पुस्‍तक पर पुस्‍तक लिखते चले गए. सैकड़ों पुस्‍तक के लेखक बन गए. पर यह सब सरस्‍वती मिश्र के चलते ही हुआ. उनकी शख्‍सियत के पीछे उनका भी एक बड़ा त्‍याग है. वे पीएचडी कर रही थीं. कर चुकी होतीं तो वे भी कहीं अध्‍यापक होतीं पर उन्‍होंने गृहस्‍थ और सहचरी होना चुना. इसी में वे मगन रहती थीं. उन दोनों के बीच उम्र का आठ साल का फासला था पर दोनों एक सखा सहचर सरीखे दिखते थे. शुरू से ही रामदरश मिश्र को कवि जी कह कर पुकारने की उनकी आदत बन गयी थी. कभी पंडित जी भी कहा करती थीं. सारा बाजार-दुकानदौरी अपने ऊपर लेकर चलीं. हमारे समय का शायद ही कोई महत्‍वपूर्ण लेखक हो जिससे वह न मिली हों. पर गृहस्‍थी के खटराग में वे देर रात तक जुटी रहतीं. उनके बारे में रामदरश जी कहते हैं, ”हँसी उनमें यों भरी है कि खुद के गिरने पर भी हँसती हैं. हँसता मैं भी हूँ और दोनों की मिली-जुली हँसी से दीप्‍त होकर आज भी जिन्‍दगी बनी हुई हैं.” पर आज जिन्‍दगी की यह कड़ी जब टूट चुकी है तो जाने कैसा-कैसा महसूस होता होगा रामदरश जी को जो अपनी शताब्‍दी मना रहे हैं और लेखकों के बीच एक लीजेंड बने हुए हैं.

3 दिसंबर, 2023 को जब नई दिल्ली के मंगलापुरी स्थित श्‍मशान गृह में सरस्‍वती जी की चिता सजाई जा रही थी, बेटे शशांक और विवेक तथा नातेदार लेखकगण इस कार्य में उनका सहयोग कर रहे थे, मिश्रजी टुकुर-टुकुर अपनी जीवन संगिनी की अंतिमयात्रा को विषण्‍णभाव से देख रहे थे. उन्‍हें ढाढस देकर बिठाया गया. चिता जब धू-धू कर जलने लगी तो उन्‍हें कहा गया कि वे परिवारजनों के साथ अब आगन्‍तुकों को विदा करें. वे श्‍मशान गृह के मुख्‍य द्वार पर आ गए. सौ साल के रामदरश मिश्र पुत्र शशांक, विवेक, बेटी अंजली और स्‍मिता तथा परिवारजनों के साथ आगन्‍तुकों के प्रति कृतज्ञ भाव व्‍यक्‍त करते हुए उन्‍हें हाथ जोड़ कर विदा कर रहे थे. सरस्‍वती जी की इस अंतिम यात्रा के साक्षी थे लेखकगण डॉ. सुरेश ऋतुपर्ण, डॉ. जसबीर त्‍यागी, डॉ. पवन माथुर, अलका सिन्‍हा, नरेश शांडिल्‍य, ताराचंद नादान, हरिशंकर राठी, डॉ. अमरेंद्र पांडेय, रूपाभ शुक्‍ल, प्रकाशक (सर्वभाषा) केशव मोहन पांडेय, वेदमित्र शुक्ल, हंस प्रकाशन के प्रकाशक हरेंद्र तिवारी और अन्‍य लेखक, साहित्‍यकार, संस्‍कृतिकर्मी और शिष्‍यगण.

आज सरस्‍वती मिश्र नहीं हैं, पर मन में उनकी यादों की आभा भरी है. लेखकों की पत्‍नियों को याद करता हूं तो ठाकुर प्रसाद सिंह जी की पत्‍नी की याद आती हैं, जिनके न रहने पर शिवानी जी ने हिंदुस्‍तान में एक कारुणिक लेख लिखा था. डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय की पत्‍नी ज्‍योति श्रोत्रिय, फिराक गोरखपुरी की पत्‍नी किशोरी देवी, कांतिचंद सोनरिक्‍शा की पत्‍नी चंद्रकिरण सोनरिक्‍शा की याद हो आती है. सबकी अपनी अपनी खूबियां हैं. सरस्‍वती जी विदेह होकर भी साहित्‍यिक संस्‍मरणों में जीवित रहेंगी और इस बात के जानी जाएंगी कि उन्‍होंने रामदरश मिश्र जैसे शताब्‍दीपुरुष और कृती साहित्‍यकार को अपने हाथो से संवारा और रचा है.

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