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राम जन्मभूमि के लिए संघर्ष करने वाले पद्म विभूषण से सम्मानित तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य रामलला के विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा की बात करते भावुक हो जाते हैं। हिन्दुस्तान के प्रमुख संवाददाता राजीव ओझा से बातचीत में उन्होंने राम मंदिर के लिए अपने संघर्ष के दिनों को याद किया।
सवाल- जन्मभूमि पर बने मंदिर में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा होने जा रही है तो आपको कैसा लग रहा है?
उत्तर- इस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा में मैं व्याकुल हूं। मेरी यह व्याकुलता वैसी ही है जैसी किसी पिता की अपने वर्षों से बिछड़े हुए पुत्र से मिलने की होती है।
सवाल- प्राण-प्रतिष्ठा की घड़ी जब नजदीक आ रही है तो क्या आपको अपने संघर्ष के दिनों की याद आ रही है?
उत्तर- मैं तो प्रारंभ से ही इस राम मंदिर के लिए आंदोलन से जुड़ा रहा। गांव-गांव पूजा कराई, स्वयं 18 दिनों की यात्रा निकाली। तत्कालीन शासन की यातनाएं झेलीं, पुलिस के डंडे खाए और जेल भी गया। सतना जेल में आठ दिनों तक रहा। वहां का भोजन भी नहीं किया। बाहर से किसी तरह भोजन मंगाना पड़ता था। ढांचा ढहा तो मुकदमा चला। मुकदमे में भी गवाही दी। अंत में परिणाम हमारे पक्ष में आया। संघर्ष के बाद ही उत्कर्ष होता है। इतने बड़े संघर्ष और दो लाख हिन्दुओं के बलिदान के बाद रामलला का गर्भगृह में प्रवेश हो रहा है। यह हिंदुओं की आस्था की जीत है।
सवाल- कुछ संतों के द्वारा कहा जा रहा है कि मंदिर अभी अधूरा है, अभी उसका शिखर नहीं बना है। ऐसे में प्राण-प्रतिष्ठा नहीं होनी चाहिए। इस पर आप क्या कहेंगे?
उत्तर- मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा बिल्कुल उचित है। मंदिर में शिखर रहे या न रहे, गर्भगृह पूरा हो गया है। भगवान तो गर्भगृह में प्रवेश कर रहे हैं।
सवाल- क्या आप मानते हैं कि प्राण-प्रतिष्ठा पूरी तरह शास्त्रत्त्-सम्मत है?
जवाब- शास्त्रत्त् सम्मत क्यों नहीं है, जिस समय राम जी प्रतिष्ठापित हों, वही शास्त्रत्त् सम्मत है। तदैव मैं किसी के शास्त्रत्तें के ज्ञान पर सवाल नहीं उठा रहा हूं, उन्हें शास्त्रत्त् का ज्ञान है कि नहीं, वही जानें। सबसे संघर्ष कर लिया, क्या अब अपने लोगों से भी संघर्ष करें? अब सबको मंगलकामना ही देनी चाहिए।
सवाल- इधर सनातन धर्म की भी बात हो रही है, क्या हिंदू और सनातन में कोई भेद है?
उत्तर- कोई भेद नहीं है। हिंदू और सनातन दोनों एक ही हैं। हिंदू ही सनातनी होता है, दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची हैं, जैसे कमल का पर्यायवाची पंकज होता है।
जौनपुर में हुआ जन्म चित्रकूट बनी कर्मभूमि
तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य का जन्म 14 जनवरी 1950 को जौनपुर में हुआ। जन्म के दो माह बाद ही उनकी दोनों आंखों की रोशनी चली गई थी। वह रामानंद संप्रदाय के जगद्गुरु रामानंदाचार्यों में से एक हैं। विद्वान, शिक्षाविद्, बहुभाषाविद्, रचनाकार और कथावाचक के रूप में देश-विदेश में उनकी ख्याति है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2015 में उन्हें देश के दूसरे सबसे बड़े सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित किया था। उन्होंने चित्रकूट में दिव्यांग विश्वविद्यालय की स्थापना की है।
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