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ईरान और पाकिस्तान के रिश्ते भले ही आज तप रहे हों लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब ईरान पाकिस्तान पर जान छिड़कता था। दोनों देश मजबूत धार्मिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संबंधों से बंधे हुए थे। दोनों देशों के बीच दोस्ताना संबंध तब विकसित हुए थे जब ईरान पर रेजा शाह पहलवी का शासन था। तब ईरान 1947 में आजाद पाकिस्तान को औपचारिक रूप से स्वीकार करने वाला पहला देश बना था। 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, ईरान ने पाकिस्तान को भरपूर सैन्य सहायता उपलब्ध कराई थी। तब ईरान ने पाकिस्तान को दो लाख टन तेल भेजकर मदद की थी।
1971 में जब दूसरी बार भारत और पाकिस्तान के बीच जंग हुई तो ईरान ने उम्मीदों से बढ़कर पाकिस्तान को मदद की थी। ईरान ने पाकिस्तान का पुरजोर समर्थन करते हुए तब भारत को परोक्ष धमकी देते हुए यहां तक कह दिया था कि ईरान पाकिस्तान को खत्म करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं करेगा। ईरानी शाह ने तब कहा था भारत जबरन पाक पर हमला बोल रहा है। इस्लामिक देश होने की वजह से ईरानी शाह की पाकिस्तान के प्रति दरियादिली यहीं नहीं रुकी। एलके चौधरी अपने पेपर ‘भारत-ईरानी संबंधों में एक कारक के रूप में पाकिस्तान’ में लिखते हैं, 1971 के युद्ध के बाद शाह ने एक बार कहा था कि ईरान और पाकिस्तान दो जिस्म एक जान हैं।
उन दिनों, तब ईरान और पाकिस्तान दोनों ने मिलकर बलूचिस्तान क्षेत्र में बलूच विद्रोहियों के खिलाफ संयुक्त अभियान भी चलाया था। हालाँकि, शाह के शासनकाल के अंतिम वर्षों में दोनों देशों के बीच संबंधों में खटास आने लगी थी। इसकी बानगी तब देखने को मिली, जब 1974 में, ईरान के शाह ने लाहौर में आयोजित एक इस्लामी सम्मेलन में भाग लेने से मना कर दिया था क्योंकि तब पाकिस्तान ने लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी को उस सम्मेलन में आमंत्रित किया था।
पाकिस्तान-ईरान की बेपटरी होती दोस्ती का उदाहरण तब दूसरी बार देखने को मिला, जब उसी साल यानी 1974 में ही भारत के परमाणु परीक्षण ‘स्माइलिंग बुद्धा’ के लिए भारत की निंदा करने के पाकिस्तान के अनुरोध को ईरान ने खारिज कर दिया। 1979 की ईरानी क्रांति के साथ ईरान के शाह संयुक्त राज्य अमेरिका भाग गए। तब पाकिस्तान ईरान में नए शासन को मान्यता देने वाला पहला देश बन गया।
हालांकि, ईरान और पाकिस्तान के बीच संघर्ष की दास्तां 1979 की ईरानी क्रांति के साथ शुरू हुई, जब ईरान एक शिया धार्मिक राज्य में बदल गया और ईरान ने रातों-रात अपनी विदेश नीति को पश्चिम-समर्थक से पश्चिम-विरोधी के रूप में तब्दील कर दिया। उधर, पाकिस्तान ने जुल्फिकार अली भुट्टो के नेतृत्व में रूढ़िवादी सुन्नी इस्लाम की राह पकड़ ली।
शिरीन हंटर ने अपनी पुस्तक, सोवियत काल के बाद ईरान की विदेश नीति में लिखा है, “तब से, पाकिस्तान के सांप्रदायिक तनाव ईरानी-पाकिस्तान संबंधों में एक बड़ी परेशानी रही है।” इस बीच, पाकिस्तान में सैन्य तानाशाह जनरल जिया-उल-हक ने 1977 में जुल्फिकार अली भुट्टो को अपदस्थ कर दिया। जिया के तहत, पाकिस्तान, जो पहले सूफी प्रभाव था, एक कट्टर सुन्नी इस्लामवादी राष्ट्र बन गया। उधर, ईरान शियाओं का केंद्र बन गया, जबकि सुन्नी शक्ति सऊदी अरब ने अपने छद्म सांप्रदायिक संघर्षों के लिए पाकिस्तान को युद्ध के मैदान में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
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