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Hindustan Special in Kanpur: कछुए पनीर भी खाते हैं। जी हां कानपुर के पनकी धाम मंदिर से थोड़ी दूर पर ऐतिहासिक कछुआ तालाब में आप चाव से पनीर खाते कछुए देख सकते हैं। इस तालाब की कहानी इतिहास बन चुकी है। यहां रहने वाले कछुए अपने खान-पान और उम्र को लेकर भी चर्चा में रहते हैं। यहां 100 से ज्यादा कछुए 150 की उम्र पार कर चुके हैं। कुछ कछुओं की उम्र 200 वर्ष तक की बताई जाती है। पहले यह कछुए आटे की गोली और लइया खाकर मस्त रहा करते थे, मगर अब पनीर के आदी हो चुके हैं।
इन कछुओं की उन लोगों से अच्छी दोस्ती है जो अक्सर उन्हें पनीर देने के लिए आया करते हैं। खास बात यह है कि पनीर का टुकड़ा खींचने के लिए ये सीढ़ियों तक भी आ जाते हैं। आटे की गोली भी खा लेते हैं मगर इसके लिए वह ऊपर तक नहीं आते। ऐसी मान्यता है कि पनकी मंदिर के दर्शन के बाद इन कछुओं को खिलाने से धन की वृद्धि होती है। घर में खुशियां आतीं हैं। ऐसा मानने वालों की संख्या हजारों में है। ये लोग पनकी धाम मंदिर जब भी जाते हैं तो कछुआ तालाब जाना नहीं भूलते।
तालाब में 300 से ज्यादा कछुए
इस तालाब में कछुओं की संख्या 300 से ज्यादा हो चुकी है। मृत्यु दर की बात करें पिछले दस वर्षों में 5-7 कछुओं की ही मौत हुई है। अंतिम बार वर्ष 2020 में एक कछुए की मौत हुई थी। उस समय तालाब का पानी सूख गया था। इन तीन सालों में एक भी कछुआ नहीं मरा।
दादू पाठक ने खुद खोदा था तालाब
कछुआ तालाब की जमीन पांच बीघे में है जिसमें दो बीघे में तालाब है। बाकी में ग्रीनरी और नागेश्वर मंदिर है। इस मंदिर के महंत देवी दयाल पाठक कहते हैं कि उनके पांच पुश्त पहले के पूर्वज दादू पाठक ने यह तालाब खुद खोदा था। बस एक दिन उनके मन में आया तो जुट गए। कुदाल उठाई और जमीन खोदने लगे। पूरा तालाब खोदने में उन्हें तीन साल से भी अधिक लग गए। इसमें पानी भरने के लिए बंबा का इस्तेमाल किया गया। चारो तरफ तब खेत ही खेत थे। तालाब में कई तीर्थों का जल डाला गया। मछलियों को सोने की नथ पहनाकर पूजन करके छोड़ा गया। पानी का अभाव नहीं हुआ। मछलियों की संख्या दिनों दिन बढ़ती चली गई। कछुए भी आ गए। तब से कछुओं को यह जगह मुफीद लगी। धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती गई।
वर्ष 2015 में सुंदरीकरण की हुई कवायद
वर्ष 2015 में इस तालाब के सुंदरीकरण के लिए शासन ने 4.72 करोड़ रुपये स्वीकृत किए थे, जिसमें से दो करोड़ पहली किस्त के रूप में आए। अब तालाब का कायाकल्प हो चुका है। पहले ईंट की सीढ़ियां थीं और तालाब पक्का नहीं था। अब पत्थर लगे हुए हैं। कछुओं के प्रजनन के लिए टापू का भी निर्माण हो चुका है, जिस पर बैठकर कछुए सुस्ताया भी करते हैं। नगर आयुक्त शिव शरणप्पा जीएन कहते हैं कि इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रहे हैं।
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