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First National Movement : प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में निचलौल के राजा रण्डुलसेन ने तराई में अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चे की अगुवाई की थी। इससे खार खाए अंग्रेजों ने एक साल के अंदर ही राजा रण्डुसेन को पदच्युत कर निचलौल रियासत को सीधे ब्रिटिश सत्ता के अधीन कर लिया था।
महराजगंज ‘इतिहास के आईने में’ में वर्णित है कि 26 जुलाई को सुगौली में विद्रोह होने पर वनियार्ड (गोरखपुर के तत्कालीन जज) ने कर्नल राउटन को वहां शीघ्र पहुंचने के लिए पत्र लिखा। वह काठमांडू से निचलौल होते हुए तीन हजार गोरखा सैनिकों के साथ गोरखपुर की ओर बढ़ रहा था।
गोरखों के प्रयास के बावजूद वनियार्ड आंदोलन को पूरी तरह दबाने में असमर्थ रहा। इसके बाद उसने गोरखपुर जनपद का प्रशासन सतासी और गोपालपुर के राजा को सौंप दिया। किन्तु अन्दोलनकर्ता बहुत दिन तक इस क्षेत्र को मुक्त नहीं रख सके और अंग्रेजों ने पुन: इस क्षेत्र को अपने पूर्ण नियंत्रण में ले लिया। निचलौल के राजा रण्डुलसेन को आंदोलनकारियों का नेतृत्व करने के कारण राजा की उपाधि से वंचित कर दिया गया, और पेंशन भी छीन ली गई।
प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के बाद यह क्षेत्र सीधे ब्रिटिश सत्ता के अधीन हुआ
1857 के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन के बाद नवम्बर 1858 में रानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र द्वारा यह क्षेत्र भी सीधे ब्रिटिश सत्ता के अधीन हो गया। ब्रिटिश शासन काल में भूमि संबंधी विभिन्न बंदोबस्तों के बावजूद कृषकों को उनकी भूमि पर कोई अधिकार नहीं मिल सका, जबकि जमीदार मजदूरों एवं कृषकों के श्रम के शोषण से संपन्न होते रहे। किसान एवं जमीदार के बीच का अंतराल बढ़ता गया।
गांधी जी के असहयोग आंदोलन का प्रभाव इस क्षेत्र पर पड़ा
1920 में गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन शुरू किया गया, तो इसका प्रभाव इस क्षेत्र पर भी पड़ा। 8 फरवरी 1921 को गांधी जी गोरखपुर आये, जिससे यहां के लोगों में ब्रिटिश राज के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने के लिए उत्साह का संचार हुआ। शराब की दुकानों पर धरना दिया गया और ताड़ के वृक्षों को काट डाला गया। विदेशी कपड़ों का बहिष्कार हुआ और उसकी होली जलायी गयी। खादी के कपड़े का प्रचार-प्रसार हुआ। 2 अक्टूबर-1922 को इस संपूर्ण क्षेत्र में गांधी जी का जन्मदिन बेहद उत्साह से मना।
1929 में घुघली में दस हजार लोगों ने गांधी जी का किया था स्वागत
1923 में पं. जवाहर लाल नेहरू ने महराजगंज क्षेत्र का दौरा किया, जिसके बाद यहां कांग्रेस कमेटी की स्थापना हुई। अक्टूबर 1929 में पुन: महात्मा गांधी ने इस क्षेत्र का दौरा किया। 4 अक्टूबर 1929 को घुघली रेलवे स्टेशन पर दस हजार देशभक्तों महात्मा गांधी का भव्य स्वागत किया। 5 अक्टूबर 1929 को गांधी जी ने महराजगंज में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। महात्मा गांधी की इस यात्रा ने इस क्षेत्र के देशभक्तों में नवीन स्फूर्ति का संचार किया, जिसका प्रभाव 1930-34 तक के सविनय अवज्ञा आंदोलनों में देखने को मिला।
1937 में पंत तो 1940 में पं. नेहरू ने की सभा
मई 1937 में पं. गोविन्द बल्लभ पंत यहां आये और एक जनसभा को संबोधित किया। फरवरी 1940 में पुन: पंडित नेहरू यहां आये। 1942 के आंदोलन में प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना महराजगंज के क्रांतिकारियों की अगुवाई कर रहे थे। अगस्त क्रांति के दौरान गोड़धोवा गांव में प्रो. सक्सेना को उनकी गिरफ्तारी के समय गोली मारी गई, किंतु वह गोली उनके कंधे के पास से निकलते हुए उस जमींदार को लग गई जिसने प्रो. सक्सेना को बंदी बनाया था।
गोरखपुर के तत्कालीन जिलाधीश ईवीडी मास के आदेश पर 27 अगस्त 1942 को विशुनपुर गबडुआ गांव में निहत्थे नागरिकों पर गोली चलाई गई, जिसमें सुखराज कुर्मी एंव झिनकू कुर्मी नामक दो कांतिकारी वीर शहीद हो गये। पुलिस की गोली से घायल काशीनाथ कुर्मी की 1943 में जेल में ही मृत्यु हो गयी। प्रो. सक्सेना को ब्रिटिश राज के विरुद्ध षडयंत्र रचने के आरोप में 26 महीने कठोर कारावास एवं 26 महीने फांसी की कोठरी में रखा गया।
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