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सवाल अजीब सा है, लेकिन जिन लोगों ने सोशल मीडिया के पहले की दुनिया को जिया हो वह इसे ठीक से समझ सकते हैं कि दोस्तियां पहले से मजबूत हुई हैं या कमजोर! सवाल किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से है कि आपकी सूची में भले ही हजारों दोस्त हों पर असल जिंदगी में कितने आपके साथ हैं? सोचिये कि आभासी दुनिया का क्या असर असल जिंदगी पर पड़ा है? हम कह सकते हैं कि फेसबुक पर हमारे पांच हजार दोस्त हैं, और नए दोस्त बनाए नहीं जा सकते, ट्विटर पर तो खैर फॉलोअर होते हैं, लेकिन ऐसे कई मंच हैं, जहां पर कि हम अपने दोस्तों की संख्या के मामले में खुद को बड़ा बता सकते हैं, पर इनमें से कितने हैं, जिन्हें सही—सही पता होता है कि आपकी जिंदगी में चल क्या रहा है? फिर दोस्तों की इतनी भीड़ में क्यों अकेलेपन से लोग परेशान हैं, मौत को गले लगा रहे हैं, फिर एक—दूसरे की दुख—तकलीफ और खुशियों में भी वह खड़े दिखाई नहीं देते हैं?
जब दोस्ती, सोशल मीडिया, समाज जैसे कीवर्ड मेरे जेहन में आते हैं तो जाने क्यों मुझे एक अनचाहा दृश्य याद आता है और वह एक मित्र की मां के अंतिम संस्कार का है. मां के निधन का संदेश प्रसारित होने पर सोशल मीडिया और मैंसेंजर की दुनिया मित्र के दुख में शरीक होने और तमाम शोक संदेशों से भर जाती है, सैकड़ों मैसेज दिखाई देते हैं, लेकिन नदी तट पर उनके अंतिम संस्कार में दस—बारह लोग ही शामिल होते हैं, जबकि उसी समय नदी तट पर एक और अंतिम संस्कार में सौ से ज्यादा लोग दिखाई देते हैं, जो तीन ट्रेक्टर ट्रॉली में भरकर आए हैं. जाहिर है वह सोशल मीडिया से ज्यादा नहीं जुड़े हैं, लेकिन वह लोग एक—दूसरे के दुख में ज्यादा शामिल नजर आते हैं. यह एक अनुभव नहीं है, न ही सोशल मीडिया की दुनिया में खोए रहने वाले लोगों पर आरोप हैं, और न ही मेरी कोई स्थापना है. मैं बस इतना कहना चाह रहा हूं कि आप खुद सोचें कि कहीं आपके साथ भी तो ऐसा नहीं हो रहा है?
मुझे ऐसा महसूस होता है, कितने ही मामले होते हैं जहां पर कि हम सोशल मीडिया पर संदेश लिखकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं, और बदले में हमारे साथ भी फिर ऐसा ही होने लगता है, जाने—अनजाने हमने खुद की दुनिया को ऐसी दुनिया में तब्दील कर लिया है, जहां पर किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है. ऐसे में जिनके पास एक दूसरे को समय देने—लेने वाली दोस्तियां हैं, वह खुद को खुदकिस्मत मान सकते हैं.
जिन बच्चों का जन्म ही सोशल मीडिया के अतिरेक वाली दुनिया में हुआ हो, वह तो खैर इस भाव को उतनी शिद्दत से महसूस ही नहीं कर पाएंगे कि पहले किसी को किसी की याद भी आया करती थी, यह दूरी हमारी तड़प को बढ़ाकर प्रेम को और समृद्ध ही किया करती थी, लेकिन पता नहीं किसी को किसी की याद आती भी है या नहीं, और यदि आती है तो अब उस तरह से बयां भी कहां होती है, जैसे हम पत्र लिखकर कर लिया करते थे. अब तो हमारे पास वीडियो कॉल की सुविधा है, फिर भी देखिए कि आप कितने मित्रों के हालचाल लेते हैं और आपके हालचाल कितने मित्र लेते हैं. कई मामले तो ऐसे भी देखने में आए कि उन मित्रों की वॉल पर भी जन्मदिन की बधाई के संदेश लिखे गए हैं जो इस दुनिया से कूच कर गए हैं.
सोशल मीडिया एक दूसरे के काम को जानने और मन की खिड़कियों पर दस्तक देने का एक अच्छा टूल जरूर है, लेकिन वह केवल टूल है, जिंदगी नहीं है. उसका टूल की तरह ही उपयोग होना चाहिए, लेकिन यदि उसे असल जिंदगी के विकल्प की तरह समझ लिया जाएगा तो तकलीफ हमें ही होगी, क्योंकि उससे अकेलापन निरंतर बढ़ता जाएगा और अंत में समाज एक नए अवसाद का शिकार होगा.
समाज दोस्तियों से जिंदा रहा है, यकीनन दोस्तियों ने एक—दूसरे को संभाला है, उन स्थितियों में भी जब कई मर्तबा हमारे अपने साथ खड़े नहीं पाए जाते तब ये दोस्त ही होते हैं, जो कुछ भी कर जाते हैं, इस नायाब रिश्ते को सोशल मीडिया की सीमितता के नए खतरे से बचकर रहना होगा, सभी को यह समझना होगा कि कहीं जाने—अनजाने में कुछ खत्म तो नहीं हो रहा, आपके जीवन से कुछ रीत तो नहीं रहा है, इस दोस्ती के दिन पर खुद के लिए बस इतना सोचिएगा, और अपने यारों से सोशल मीडिया पर नहीं बल्कि असल जिंदगी में मिलते रहिएगा.
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