Home National अपर्णा ने सुधीर के हाथों को आहिस्ता से चूम लिया, पढ़ें बेहद रोमांटिक प्रेम कथा

अपर्णा ने सुधीर के हाथों को आहिस्ता से चूम लिया, पढ़ें बेहद रोमांटिक प्रेम कथा

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अपर्णा ने सुधीर के हाथों को आहिस्ता से चूम लिया, पढ़ें बेहद रोमांटिक प्रेम कथा

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तरुण भटनागर का नया उपन्यास ‘बेदावा-एक प्रेमकथा‘ राजकमल प्रकाशन से छपकर आया है. इसमें आंखों से न देख पानेवालों, ट्रांसजेंडरों और दगाबाज़ों की अनदेखी दुनिया के इश्क का बड़ा ही रोचक फसाना है. ‘बेदावा’ में हमारे दौर की मज़हबी नफरतों और दुश्वारियों से भिड़ते उन लोगों की कहानी है जो हार नहीं मानते. यह इश्क का ऐसा क़िस्सा है जो आदमी और औरत के इश्‍क से अलहदा इंसानियत के फलसफे को गढ़ता है. प्रस्तुत है इस उपन्यास का एक अंश ‘लैवेंडर‘-

‘कल तुम अचानक चली गईं…ऐसा क्या हुआ?’
रात को अपर्णा को बहुत कुछ याद आता रहा…रात के अंधेरे में अदीब से हुई एक पोशीदा मुलाक़ात. वह आखि‍री मुलाकात थी. पर फिर भी एक उम्मीद थी उससे दुबारा मिलने की. अदीब कहता रहा- ‘एक वादा करो…बोलो करोगी…वादा कि न कहोगी किसी से कभी नहीं…बोलो, करो वादा…’ वादा था कि चुप रहना…हमेशा चुप…एक लफ़्ज भी कभी किसी को न कहना. वह कहना चाहती थी कि तुम अगर मुसलमान न होते तो यह सब इस तरह न होता…है न… अपर्णा ने दूसरी तरफ मुंह घुमा लिया था. अदीब का उस मजहब का होना अपर्णा के लिए कुछ इस तरह हो गया था, मानो उसके जिंदा जिस्म से कोई बहुत इत्मीनान से खाल उतार रहा हो और उसे इस तकलीफ पर रोने की भी मनाही हो.

‘नहीं बस यूं ही… कुछ ख़ास नहीं.’
आशिक से वादे के सामने अपर्णा चुप है. वह कुछ कह भी नहीं सकती. सुधीर के ‘क्यों’ का जवाब है, पर कुछ बातों को कहना बहुत कठिन है. एक ख़याल रात भर तारी होता रहा. एक बेहद ख़ौफनाक ख़याल. ख़याल कि मानो इस फ़ेहरिस्त के किसी नम्बर पर अदीब का नाम भी दर्ज हो.
‘एकदम. मौत को बांटकर क्या देखना. मौत मौत है.’
सुधीर ने थोड़ा सोचकर कहा. अपर्णा ख़ामोश रही. छत को घूरती.
‘मौत मौत है. मौत हिंदू या मुसलमान नहीं होती.’
वह सुधीर की बात का विरोध करना चाहती थी, पर अदीब से किया वादा कहीं अटकता था…उसके पास सबूत थे, पर वह चुप रहना चाहती थी…फिर यह सिर्फ़ वादा भर न था, इसको बताने के कुछ और भी ख़ौफनाक अंजाम हो सकते थे…अदीब को लेकर अपनी ख़ामोशी पर अपर्णा को आजकल ख़ुद पर थोड़ा फख़्र होने लगा है…
‘आगे सुनाओ…’
‘न, आज तुम सुनाओगे.’
‘यार तुम्हारा किस्सा बड़े इंट्रेस्टिंग मोड़ पर है…तुम और तुम्हारा आशिक दोनों आशिक के बेडरूम में तनहा…सौदाई इश्ककी धधकती आग के साथ एक ऐसी जगह तनहा जहां कोई आ नहीं सकता…इश्क का नशा हो और साथ-साथ इत्मीनान भरी, सुकून भरी ख़ामोशी और दोनों अकेले हों तो इससे रोचक किस्सा और क्या होगा भला…सुनाओ न…’
‘मैंने कहानी को जानबूझकर इंट्रेस्टिंग मोड़ पर छोड़ दिया है.’
‘क्यों भला?’
‘ताकि तुम्हारे जैसे टस से मस न होने वाले इनसान से दोनों कहानियां सुन लूं. पहली यह मरहूम लोगों वाली और दूसरी कैमिला की मसाज वाली.’
‘बड़ी दुष्ट हो…’
‘तुम्हीं न कहते हो कि किस्से इश्क लड़ाते सांपों की तरह होते हैं…मोहब्बत में एक-दूसरे में गुंथे.’
‘एकदम दुरुस्त…’
‘पहले कैमिला, बाद में इन मौतों का किस्सा…’
‘ठीक है…’
थोड़ी देर चुप रहने के बाद सुधीर ने बताना शुरू किया.
‘तुम ठीक कहती हो अपर्णा, कैमिला जैसी औरतें एक अलग मिट्टी की बनी होती हैं. अपने मुल्क स्पेन के बारे में जब वह अपनी उजली-उजली आंखों से बताती तो लगता शायद स्पेन से चलकर ही बसंत की फिज़ाएं हमारे मुल्क में आती हों…’
‘उजली-उजली आंखें? तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे तुमने उसकी आंखें देखी हों.’
‘तुम टोको नहीं यार. बस बहते अफसाने में पैर डालकर उसके पानी के गुनगुनेपन को महसूस करो. यक़ीन करो मुझे अपनी तरह से दीखता है.’
‘अच्छा ठीक है..’

सुधीर के सामने अपर्णा आलथी-पालथी मारकर बैठ गई- ‘अच्छा, ठीक है…’

…कहते हैं, उत्तर अफ्रीका से जो गर्म हवाएं बहती हैं, सहारा के तपते रेगिस्तान को पार करती हुई, वे भूमध्यसागर की नमी को पीकर गुनगुनी हो जाती हैं और फिर भटकती रहती हैं स्पेन की घाटियों, पहाड़ों, जंगलों और शहरों में… गुनगुने पानी की नन्हीं बूंदों से भरी वे हल्की गर्म हवाएं बहुत आवारा हैं, बदचलन भी. स्पेन के खेतों में पकने को तैयार होते अंगूरों के जिस्म को उनका गुनगुनापन सहलाता रहता है, दुनिया की कुछ बेहद नशीली शराब के लिए उनके जिस्म में मिठास घोलता. स्पेन की न जाने कितनी अनाम-अनजान घाटियों में खिलने को बेताब डेफोडिल्स, पॉपी और लैवेंडर के फूल इन मदहोश करने वाली हवाओं के मुंतज़ि‍र रहते हैं. लाखों-करोड़ों की संख्या में दुनिया से बेख़बर आसमान की ओर टकटकाते, कंपकंपाते वे इन्तज़ार कर रहे होते हैं अपने-अपने रंगों के साथ. लेवान्टे, लेस्टे, सिरैक्को, टैरेल, लैवेचे…न जाने किन-किन नामों की कितनी-कितनी तो गुनगुनी गर्म हवाएं बहती रहती हैं स्पेन की सरज़मीं पर उसकी मोहब्बत में पैबस्त…जैसे हमारे मुल्क में आती है लू, काल बैसाख और मैंगोशावर ठीक वैसे ही… ठंड से ही स्पेन के समन्दर की रेत इन्तज़ार करती है कि कब आएगी लेवान्टे, सिरक्को और टैरेल हवाएं ताकि लौट आएं उसके रेतीले फैलाव से चिपककर धूप को तापते दुनिया के कुछ बेहतरीन जिस्म. स्पेन में एक कहावत चलती है, एकदम सही कहावत कि “आसमान में जन्नत वे ही लोग देखते हैं जिन्होंने स्पेन नहीं देखा…”

स्पेन में हर हवा की घाटियां तय हैं. तय हैं हर हवा के जंगलात, खेत, आसमान, शहर और अवाम. वह सब जिनके लिए वे आएंगी अपने सबसे कामुक रूप में. इतनी मदहोश और इश्क़बाज़ कि कभी सिरक्को की घाटियों में टैरेल नहीं बहती और न लेस्टे के जंगलों में भूल के भी आने का कोई ख़याल पालती हो लेवान्टे या लैवेचे. इतनी बावफ़ा. जब स्वीट-पी की रंग-बिरंगी पत्तियों को उसकी माशूक़ हवाएं सहलाती हैं तभी वह बीज हो पाती हैं. मुस्कुराते से लटकते तमाम पीले-लाल फल चाटते रहते हैं हवाओं का जिस्म अपने खट्टे-मीठे स्वाद को और ललचाने वाला बनाने. विलो, ऐल्म, फर, ऐवेकाडो, ओलिव, पाइन और ओक के पेड़ों की शाखों पर बैठी तमाम रंगों की तमाम चिड़ियाएं तैयार करती रहती हैं मौसम का कोई नया राग जिसकी संगत को चली आती है पूरी कायनात बन्द खींचती, ठोंकती हथौड़ी से गुट्टों को, चाटी पर उंगली की थपक दे कान पास कर आवाज़ को तौलती, थपक से उठते नाद को दुरुस्त करती…

दुनिया की कुछ बेहतरीन इश्क़ की कविताओं और मोहब्बत के क़िस्सों को स्पेनिश ज़बान ने संजोया, अपने ज़ेहन में, अपनी नसों में, अपने ख़ून में…दुनिया के उन तमाम हिस्सों में जहां-जहां स्पेनिश लोग गए वहां-वहां थोड़ा सा चला गया था, उनका मुल्क भी…जब ख़्वाबों में सिरक्को हवा बहती, जब नींद के रास्ते चले आते पॉपी के फूलों के लाल सुर्ख रंग, जब किसी बेख़याली में फेफड़ों में उतरती लैवेंडर की ख़ुशबू, जब टैरेल और लैवेचे की मोहब्बत की मिठास की शराब फड़काती नसों को, जब कोई बहुत परिचित पर अलहदा रह आया ज़ायक़ा ज़बान पर फैलता, जब जिस्म को थपथपाता गुनगुनाता पानी…तब स्पेनिश का कोई कवि अपने मुल्क से हज़ारों मील दूर कहीं किसी अनजान दुनिया में रच रहा होता इश्क़ की कोई अद्भुत कविता… कहते हैं दक्षिण अमेरिका के समुद्र तटों पर संसार के सबसे ख़ूबसूरत जिस्म दीखते हैं, बताओ भला अगर वे सबसे ख़ूबसूरत न हों तो कौन हों…
…सुधीर के कमरे की दीवार पर एक घड़ी टंगी थी, टिकटिकाती, अपनी हथेली पर अपनी ठुड्डी टिकाए चुपचाप सुनती सब कुछ…

‘…कैमिला जिस कमरे में रहती थी वह एक बेहद नफ़ासत भरी जगह थी. कमरे में बहुत कम चीज़ें थीं, पर जैसे कमरे की हर चीज़ की दुनिया में सबसे सही जगह उस कमरे में उसकी अपनी जगह ही हो. एक दिल को छू जाने वाली तरतीब. एक शै से दूसरी शै के बीच एक ऐसा ख़ालीपन, ऐसी ख़ामोशी कि मन झरना-झरना हो जाए…’
…दूर कहीं जाती किसी ट्रेन की मद्धि‍म-सी आवाज़ ने अभी-अभी बाथरूम से आती टपकती बूंदों की आवाज़ से संगत की थी, कोई पुरानी फ़िल्मी धुन हवा के साथ लहराती सुनाई देती, ग़ायब होती, फिर सुनाई देती…एक शोर करती चुप्पी थी हर आवाज़ को बुहारकर अपने बोरे में भरती…

‘कैमिला के कमरे की हर चीज़ ऐसी लगती मानो शायरी की तरह से लिखी गई किसी इबादत में अपनी आंखें बंद किए हो. कमरे की हर शै आकार और रंगों की कोई ग़ुलाम हो जैसे. कमरे में अपनी-अपनी मुख़्तलिफ़ जगहों पर रखे जाने से पहले हर चीज़ के दिल पर जैसे मोहब्बत की कोई इबारत लिख दी गई हो. इतना साफ़ और शफ़्फ़ाफ सा वह कमरा कि मैं दरवाज़े के बाहर अपनी चप्पलें उतारकर डोरमैट पर अपने पैर रगड़ने के बाद भी भीतर फर्श पर पैर रखते सकुचाता. कोई चीज़ उस कमरे में ऐसी न थी जो ग़ैरज़रूरी हो…कोई तिनका, कोई टुकड़ा, कोई किनारा…कुछ भी ऐसा नहीं जो ज़रूरत से एक इंच भी ज़्यादा हो…’

‘तुम इस तरह से मत कहो सुधीर वर्ना मुझे फिर से तुम्हारे अन्धे होने पर शक हो आएगा. तुम इस तरह से किसी सीन को कैसे कह सकते हो? कहीं मैं फिर से तुम्हारा चश्मा न उतार दूं…यार..’

अपर्णा ने ख़ुद में डूबते हुए कहा.

‘उसका कमरा उस मल्टी स्टोरी में सबसे ऊपर था. उसके ऊपर बस छत थी आसमान के समानान्तर बिछी हुई. उसके फ़्लैट से लगा कोई दूसरा फ़्लैट न था वहां. उसकी ख़ामोशी में एक बेहद कामुक-सी चुप्पी घुलती रहती थी. उसे जिस बिस्तर पर मैं मसाज देता था उसकी पूरी लम्बाई में फैली एक विशाल खुली बालकनी थी. एकदम खुली, फरफराती. जिसके पार आसमान के नंगे जिस्म पर सरकते कपासी बादल दीखते थे. आसमान उसके कमरे की बालकनी में लटकते झीने पर्दे से अपनी जिस्म को छुपाने की नाकाम कोशिश में लगा रहता. उसके कमरे में कोई न आता-जाता था. आसपास कहीं किसी की कोई आवाज़ न आती थी. किसी के आने की कोई उम्मीद भी न थी. मोम और एक बेहद अजनबी मुल्क की मदहोश करने वाली ख़ुशबू से सराबोर उसका कमरा मानो जन्नत का कोई टुकड़ा हो…’

‘अच्छा…तो आपने आसमान भी देख लिया और उस पर लटकता झीना पर्दा भी..’
‘प्लीज़ बी क्वाइट…’
अपर्णा मुस्कुरा दी.
‘तो वही कैमिला एक बात कहती थी.’
‘अच्छा एक बात तो बताओ सुधीर, वह स्पेनिश थी, तुम्हें स्पेनिश आती नहीं…फिर कैसे उसकी बात समझते थे…’
‘अपर्णा यार मेरा मूड न ख़राब करो… तुम्हें किस्सा सुनने का ज़रा सा भी शऊर नहीं. कुछ चीज़ें अपने हिसाब से सोच लो. ख़ुदा ने दिल और दिमाग़ दोनों तो बख़्शे हैं तुम्हें…’

कैमिला सुधीर से कहती थी कि जब कोई अपने मुल्क से बहुत दूर होता है किसी पराए मुल्क में, ठीक उसकी तरह से, साल भर से लौटने की जुगत में पैसे बटोरता, तब वह बहुत अकेलापन महसूस करता है. पराए मुल्क की अजनबीयत उसके दिलो-दिमाग़ पर तारी होती रहती है. सबसे भयानक अकेलापन होता है लोगों के बीच होकर भी इस बात का अहसास होना कि यह जगह उनका अपना मुल्क नहीं. तमाम लोगों के बावजूद भी इस पूरी सरज़मीं पर आप एक दूसरी ज़मीन में बेहद अजनबी किस्म की शै के अलावा और कुछ भी तो नहीं.

…और तब उसके भीतर-भीतर मोहब्बत की आग धधकती जाती. उसे लगता कि वह जितनी अकेली होती है प्यार की भूख उतनी बढ़ती है. पराए मुल्क का अकेलापन सबसे भयानक होता है इसलिए वह इश्क़ की सबसे शोख़ प्यास को भड़काता है. उसे लगता कि जब कोई अपने मुल्क में होता है तो उसे इश्क़ का मोल पता नहीं होता. उसे चारों ओर बेहद परिचित चेहरों से टपकता अपनापा दीखता रहता है. अपने मुल्क में इनसान अकेला होकर भी प्यार की दुनिया में जी रहा होता है. पर पराए मुल्क में वह सिर्फ़ अकेला होता है, एकदम अकेला. वह सुधीर से कहती कि जब वह स्पेन में थी उसे कभी पता ही नहीं चला कि उसका मुल्क कितना मादक और इश्क़बाज़ है. मुल्क की मिट्टी की फितरत ही ऐसी है कि उससे इश्क़ का पता तब चलता है जब आप उससे कोसों दूर होते हैं…और तब उस इश्क़ का न होना एक ऐसी प्यास जगाता है कि लगता है, मानो इस प्यास की कोई इंतहा ही न हो. वह कहती है कि सुधीर उससे जो यह कहता है कि उसका जिस्म गर्म है और जब वह उसे मसाज देता है तो उसके जिस्म की गर्मी सुधीर की हथेली पर उतर आती है, तो वह कहती कि यह इश्क़ की ऐसी तड़प है जो कोई समन्दर भी न बुझा पाए. सुधीर एक ख़याल के साथ उसे मसाज देता रहता- समन्दर भी कभी किसी की प्यास बुझा पाया है भला, अपने अनूठे नमकीनपन और ऐसी अजीम शान के बाद भी. तड़पकर दहाड़ती और बिखर-बिखर कर पानी-पानी होती, फैलकर झागों से चट्टानों को नहलाती, अपने रेतीले किनारों से रात-दिन मोहब्बत करती लहरों के बाद भी समन्दर किसी की एक बूंद प्यास भी कहां मिटा पाया..
सुधीर को मोम की गन्ध का ऐसा चस्का लगा कि वह मोमबत्तियां बनाना सीखना चाहता था. मोम की ख़ुशबू उस पर इस तरह तारी होती कि वह अक्सर कैमिला को मोमबत्तियां बनाना सिखाने को कहता रहता.

कैमिला को मोहब्बत चाहिए थी और सुधीर कैमिला से मोमबत्तियां बनाना सीखना चाहता था.
पराए मुल्क की सरज़मीं पर प्यार की तलब गहरी होती जाती थी.
सुधीर के मन में औरत का एक अधूरा अक्स था…बरसों का अधूरा, पूरा होने को आतुर, उकसाता हुआ अक्स..
‘…क्या तुम मुझे मोमबत्तियां बनाना सिखाओगी?’
वह बाथरूम से हाथ धोकर आया था. कैमिला ने अपने ऊपर गाउन डाल लिया था और बिस्तर के कोने पर बैठी थी. उसने सुधीर को ऊपर से नीचे तक देखा—
‘..एक शर्त है…’
कैमिला ने उसके चेहरे को देखते हुए कहा. वह जान नहीं सकता था कि कैमिला उसे किस तरह से देख रही है.
अपर्णा बहुत देर से चुपचाप सुन रही थी.
‘फिर से शर्त.’
अपर्णा ने कहा.
‘हां…पर उस शर्त से एक और मकसद पूरा होता था.’
‘एक और मकसद?’
अपर्णा ने सुधीर को अचरज से घूरा.
‘हां…एक और मकसद. मेरा अपना मकसद. मेरा मकसद जो उसे कभी पता न चल सकता था. एक मकसद जो उसकी मोहब्बत की प्यास और मेरे कैंडल बनाना सीखने से भी ज़्यादा इन्टेंस था. इन दोनों से कहीं ज़्यादा कामुक, कहीं-कहीं ज़्यादा उतावला..’
…किनारे स्टूल पर जग में पानी रखा था. खिड़की से आती धूप में तपता हुआ. उसके स्टील के चिकने जिस्म पर सूरज चढ़ रहा था धीरे-धीरे. पानी की सतह पर धूल की एक झीनी-सी परत थी मानो कोई शोला-शोला जिस्म कपड़े लपेटकर पानी से बाहर आते-आते रुक गया हो यकायक. नीम का एक सूखा पत्ता मवाली की तरह उड़कर आया था खिड़की के रास्ते पानी की सतह के साथ हमबिस्तर हो जाने…

‘तुम जानती हो मैं औरत को देख न सकता था. औरत को देखने का एक ही रास्ता मेरे पास था कि मैं उसके हर वक्र, हर उभार, हर गर्त, हर सतह, हर ज्यामितीय…पर अपनी उंगलियां फिरा सकूं, अपनी हथेलियां चला सकूं… पर ऐसा कर पाना मुश्किल था. औरत को एक बार देखने का ख़याल मुझे रात-दिन परेशान करता. पागलों की तरह भड़भड़ाता रहता मेरी जिस्म की खिड़कियों के पल्ले… धूल भरी, धूप नहाई तूफ़ानी हवा में पागलों की तरह डोलती, लहकती रहतीं मेरी नसों की एक-एक शाख़ ख़ून के पत्तों से लदी-फंदी..’

‘जानती हो एक गुनाह होता है. ज़ेहन में घुसते ख़ंजर-सा, नज़्म के हर लफ़्ज़ से बलात्कार करता-सा एक गुनाह…’
‘क्या…क्या सुधीर…?’
‘औरत की पत्थरों से बनी मूर्ति, प्लास्टर ऑफ़ पेरिस में ढला औरत का कोई मुजस्समा और मोम से बने औरत के किसी बुत को छू-छू कर औरत को देखने की कोशिश करने का गुनाह. यह जानकर भी कि हर मुजस्समा आत्माविहीन होता है, पर फिर भी उसे छूकर औरत को महसूस करने का जरायम. किसी मृत शै में, किसी बेज़बान चीज़ में, किसी मिट्टी में औरत को तलाशने का ज़ुर्म. एक फ़रेब, एक दुश्नाम कि पत्थरों और मिट्टी के मार्फत दीख सकती है औरत.’

‘मैं थोड़ा-बहुत कुछ जान पाया था औरत के बारे में कि वह कैसी दीखती होगी. कैमिला की चंपी करते, उसे मसाज देते मैं कुछ-कुछ जान पाया. पर इस काम में भी महसूस कर देखने की एक सीमा है. मसाज वर्जनाओं से भरा काम है. मैं वर्जना को तोड़कर औरत को पूरी तरह से देखना चाहता था.’

‘न देख पाने की सबसे बड़ी तकलीफ़ औरत को न देख पाना है.’
…कहीं कुछ चटका हो जैसे कोई कांच का गिलास किचन में, कोई चूड़ी अचानक…कोई, किसलिए, कुछ, जो सिर्फ़ सुधीर को सुनाई देता हो, दुनिया को तमाम अनसुनी सदाओं की तरह…
‘चंपी और मसाज के मार्फत जो दीखा वह नामुकम्मल था. मेरे अंधेरों में औरत का एक अधूरा अक्स था, मेरी जवानी के कैनवस पर एक आधी-अधूरी तस्वीर थी जिसे औरत कहते हुए मुझे झिझक होती थी, मेरी तमन्नाओं के आसमान में कोई औरत न थी क्योंकि मेरे लिए अभी तक औरत का इस ज़मीं पर अवतरण न हुआ था…’
‘…जो नहीं देख सकता वही देख सकता है सुधीर…क्योंकि वह देखने के मोल को समझता है..’
…चूल्हे पर छोड़ आई गंज का बहाना लेकर अपर्णा चौके में आ गई. चौके में थोड़ी देर रो लेने के लिए कोई कोना न था. उबलते पानी से उठती भाप चारों ओर फैल रही थी. अपनी पनीली गरमाहट में खदबदा चुके पानी के असंख्य कणों को संजोये वह भाप धीरे-धीरे हवा में घुलती जा रही थी.
‘…कैमिला की शर्त में औरत को देख पाने की गुंजाइश थी…जिसकी वजह से मैंने कैमिला की शर्त को मान लिया था…’
‘फिर क्या हुआ?’
‘बाक़ी बाद में…’
‘ये क्या बात हुई?’
‘इंट्रेस्टिंग मोड़ पर कहानी को तो मैं भी छोड़ सकता हूं.’
‘ओह! तो ये बात है.’
अपर्णा का मन दुखी था. सुधीर को ख़ुश देखकर वह भी ख़ुश हो ली. उसने सुधीर के हाथों को अपने हाथों में लेकर आहिस्ता से चूम लिया.

तरुण भटनागर भारतीय प्रशासनिक सेवा में अधिकारी हैं. तरुण के तीन कहानी संग्रह ‘गुलमेंहदी की झाड़ियां’, ‘भूगोल के दरवाजे पर’ और ‘जंगल में दर्पण’ प्रकाशित हो चुके हैं. ‘लौटती नहीं जो हँसी’, ‘राजा, जंगल और काला चांद’ तथा ‘बेदावा’ तरुण के चर्चित उपन्यास हैं. उन्हें ‘वागीश्वरी पुरस्कार’, ‘शैलेश मटियानी कथा पुरस्कार’, ‘स्पंदन कृति सम्मान’, ‘हिन्दी सेवा सम्मान’ और ‘वनमाली युवा कथा सम्मान’ से सम्मानित किया जा चुका है. छत्तीसगढ़ के रायपुर में 24 सितंबर को जन्मे तरुण भटनागर की कहानियों का मराठी, अंग्रेजी, तेलगू और उड़िया में अनुवाद हो चुके हैं.

Tags: Books, Hindi Literature, Hindi Writer, Literature

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