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चलिए प्रकृति की अद्भुत कारीगरी लिविंग रूट ब्रिज की सैर करते हैं

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चलिए प्रकृति की अद्भुत कारीगरी लिविंग रूट ब्रिज की सैर करते हैं

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हाइलाइट्स

मेघालय अपने राज्य बनने के 50वें वर्ष का जश्न मना रहा है.
इस पूरे साल यहां कई तरह के आयोजन होते रहेंगे.
लिविंग रूट ब्रिज खासी और जयंतिया समुदाय के जीवन का हिस्सा हैं.

सोचिए एक घना जंगल है. इसमें पेड़ों की जड़ें और दूसरे हिस्से एक-दूसरे से से जुड़े हैं. यह गठजोड़ इतना सघन है कि इसे नदी को पार करने के लिए पुल की तरह इस्तेमाल किया जाता है…
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ये पुल खासी और जयंतिया समुदाय के जीवन का हिस्सा हैं. इन पुलों का इस्तेमाल स्थानीय लोग मानसून में नदी पार करने के लिए लंबे समय से कर रहे हैं.

घने जंगलों के बारे में सोचिए जिसमें पेड़ों की जड़ें नदी के एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैले हैं. इनका इस्तेमाल पुल की तरह एक सिरे से दूसरे सिरे को पार करने के लिए किया जाता है… आपको लगता है कि यह जादू है? प्रकृति की ताकत और किस्से कहानियों वाले बौने, जो अपने गीतों से पेड़ों को मनचाहे आकार में ढाल सकता है? आपको जेआरआर टोल्किन के एंट्स का भी ख्याल आ सकता है – वे राजसी पेड़, जो चल सकते थे और बात कर सकते थे (सरुमन टावर को भी नष्ट कर सकते थे!)? हो सकता है कि आपने जे. के. रॉलिंग की हॉग्वर्ट्स कैंपस के व्हूपिंग विलो के बारे में सोचा हो – एक ऐसा पेड़ जिसके आसपास कोई भी आता था, तो उसे ‘’जोरदार तमाचे’’ मिलते थे! इनमें से किसी का भी ख्याल आया हो, लेकिन सबमें एक बात आम है. ये सब प्रकृति की शक्ति और सत्ता को दिखाते हैं. इन पेड़ों में दूसरों की रक्षा करने की क्षमता है. ये पेड़ लोगों की मदद करते हैं और उन्हें राहत पहुंचाते हैं.

लिविंग रूट ब्रिज पेड़ों के जड़ों के प्राकृतिक तौर पर एक-दूसरे से जुड़ने और सघन घनत्व की वजह से बनते हैं. यह किसी जादू की तरह है, लेकिन कोरी कल्पना नहीं है.

मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज के बारे में जानते हैं.

इन पुलों से स्थानीय खासी और जयंतिया समुदाय मानसून में उफनती नदियों को पार करते हैं. यह तरीका सदियों पुराना है. पहला रूट ब्रिज कैसे और कब बनाया गया था, इसके बारे में कोई लिखित इतिहास नहीं है. हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि ये सदियों पुराने पुल मज़बूती से टिके हैं. लिविंग रूट ब्रिज पर पहली बार चलने का और देखने का अनुभव आप कभी नहीं भूल सकते हैं. हर पुल का अपना एक पारिस्थितिकी चक्र है, जो जीवन से भरपूर नजर आता है. इन पुलों को देखकर आपको अहसास होगा कि प्रकृति और इंसान मिलकर कितनी सुंदर रचना कर सकते हैं.

इन पुलों का निर्माण कैसे होता है?
इन पुलों को बनाने के पीछे प्यार है, यह जानकर शायद आपको थोड़ी हैरानी हो सकती है. दशकों की मेहनत के बाद ये पुल बनते हैं. इन्हें बनाने के लिए सबसे पहले, नदी के किनारे एक सही जगह की पहचान की जाती है. इसके बाद फिक्स इलास्टिका, रबर अंजीर के पेड़ लगाए जाते हैं. इन पेड़ों की खासियत होती है कि इनकी जड़ों में सघन उलझाव रहता है और यह प्राकृतिक तौर पर एक-दूसरे से जुड़ती जाती हैं. इन पेड़ों को पर्याप्त ऊंचाई तक पहुंचने और जड़ों के एक-दूसरे से जुड़ने में एक दशक का समय लगता है. इसके बाद एक एक और दशक इनकी हवाई जड़ों को बनने और मजबूत होने में लगता है. लगभग दो दशक में पुल के तौर पर इस्तेमाल होने वाली मजबूत संरचना बनकर तैयार होती है.

पुल बनाने का यह तरीका सदियों से इस्तेमाल किया जा रहा है. खासी पुल बनाने वाले हवाई जड़ों को एक बांस मचान पर बुनते हैं और फिर धीरे-धीरे इन जड़ों को नदी के उस पार ले जाते हैं. अंत में इन जड़ों को नदी के एक दूसरे किनारे पर लगाया जाता है. पुलों की मज़बूती के लिए हर दो साल में बांस की मचान बदलना होता है. बारिश और मौसमी परिस्थितियों की वजह से बांस में नमी आ जाती है और उनके सड़ने की आशंका रहती है. समय के साथ, ये जड़ें मोटी हो जाती हैं और दूसरी तरफ एक और रबर के पेड़ से जुड़ जाती हैं. एनास्टोमोसिस एक प्रक्रिया होती है, जिसके तहत ये इनका सघन जुड़ाव बनता है – इसमें लत्तियां, शाखाएं और हवाई जड़ें आपस में गुत्थ-गुत्था होने की तरह सघन रूप से फैलती हैं. जड़ों का यह जाल समय के साथ मज़बूत होता जाता है. यह प्राकृतिक बायोइंजीनियरिंग का उदाहरण है. इनमें से कुछ पुल तो ऐसे हैं जिन पर एक साथ 50 लोग चढ़ सकते हैं!

औसतन, ये पुल 50 से 100 फीट के हिस्से में बढ़ते हैं. हालांकि, सबसे लंबा ज्ञात जीवित मूल पुल, 175 फीट तक फैला है और पूर्वी खासी हिल्स जिले के मावकिर्नोट के पास है.

पीढ़ियों को जोड़ने का काम
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इन पुलों को बनाना बच्चों की परवरिश करने जैसा है, जिसमें दशकों लग जाते हैं. इन्हें बनाने के लिए पूरा गांव मिलकर मेहनत करता है. हर पुल की निगरानी, ​​विकास और रख-रखाव के लिए सामूहिक तौर पर प्रयास किए जाते हैं. इन्हें पूरा करने का काम कई पीढ़ियां करती हैं. जिन नए पुलों को आज बनाया जा रहा है, उनकी देखभाल आने वाली पीढ़ियां करेंगी. इस तरह से हर पुल, समुदाय की आने वाली पीढ़ियों के लिए एक तोहफा होता है. प्राकृतिक संपदा का प्रबंधन और संरक्षण करना मेघालय संस्कृति का हिस्सा है, जिसे आप इन पुलों में देख सकते हैं. हर पीढ़ी आने वाली पीढ़ियों के इस्तेमाल, आनंद और प्यार के लिए कुछ सुंदर बनाती है.

बेशक, इन पुलों से इंसान प्यार करते हैं, लेकिन ये प्रकृति के लिए भी वरदान हैं.

इंसान ही नहीं जानवरों के आने-जाने के लिए भी परफेक्ट हैं ये पुल
अंजीर के पेड़ जैव विविधता के लिए बहुत अच्छे होते हैं: उन पर काई उगती है, गिलहरी उनकी शाखाओं में रहती हैं, उनकी छतरी के भीतर पक्षियों के घोंसले होते हैं और वे परागण में मदद करने वाले कीड़ों का भी घर हैं. इन पेड़ों को पुल बनाने के लिए इंजीनियरिंग की जाती है, खासी समुदाय बहुत सारे ग्रीन कॉरिडोर बनाने में सफल रहे हैं – इन पुलों पर जानवर भी आसानी से आवागमन कर सकते हैं. बार्क डीयर और क्लाउडेड तेंदुए जंगल के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने के लिए रूट ब्रिज का इस्तेमाल करते हैं. ये पुल सिर्फ देखने और सुंदर नज़ारों का का हिस्सा भर नहीं हैं. अपने आसपास के पारिस्थितिकी तंत्र को सहारा देने और विकसित करने का काम भी करते हैं.

लिविंग रूट ब्रिज का भविष्य
पारंपरिक पुलों से रूट ब्रिज अलग होते हैं, क्योंकि ये पर्यावरण से ही अपने निर्माण की सारी सामग्री तैयार करते हैं. इन पुलों को बनाने में लगने वाली हर चीज़ का उत्पादन प्राकृतिक तौर पर होता है. पेड़ अपने जीवनकाल में ग्रीनहाउस गैस कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं. साथ ही, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, जिससे भूस्खलन का खतरा भी कम होता है. इसके अलावा, मेघालय में मानसून में खूब बारिश होती है और ये पुल नदियों के पानी के बहाव को नियंत्रित करते हैं. वास्तुकला का पुनर्योजी रूप होने के नाते, लिविंग रूट ब्रिज समय के साथ मजबूत होते जाते हैं. इनकी मरम्मत भी अपने-आप प्राकृतिक तौर पर होती है. ये पुल एक-जगह से दूसरी जगह जाने के लिए कनेक्टिविटी साधन हैं. साथ ही, पर्यटकों के लिए लोकप्रिय जगह हैं. स्थानीय लोगों को इनसे पैसे कमाने का भी मौका मिलता है. इसके अलावा, आसपास के पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव भी डालते हैं. एक सवाल है कि क्या ये पुल जलवायु परिवर्तन की कुछ समस्याओं का हल हो सकते हैं?

Morningstar Khongthaw (मॉर्निंगस्टार खोंगथाव) ने Living Bridge Foundation (लिविंग ब्रिज फाउंडेशन) की स्थापना की है. यह संस्था रूट ब्रिज के रख-रखाव और पुलों को बनाने की कला सक्रिय रखने के लिए काफ़ी प्रयास कर रही है. Morningstar और उनकी टीम पुराने जीवित पुलों की मरम्मत और रख-रखाव करती है और नए पुलों को बनाने में मदद करती है. साथ ही, स्थानीय लोगों को इन पुलों को बनाने और मरम्मत के बारे में शिक्षित करने के लिए क्लासरूम भी बना रहे हैं. लोगों की जानकारी बढ़ाने के लिए कई वर्कशॉप भी आयोजित किए गए हैं. दिलचस्प बात यह है कि ये क्लासरूम पेड़ों के ऊपर ही बनाए गए हैं. पुलों के अलावा, सीढ़ियां, झूले, बैठने के लिए प्लैटफॉर्म और यहां तक ​​कि सुरंग भी बना रही है – यह आश्चर्य की बात है, लेकिन कितनी खास बात है कि नई इमारतें बनाने के बजाय हम अपनी पुरानी विरासत और स्थापत्य कला को जीवित कर रहे हैं.

पश्चिमी शोधकर्ताओं का मानना ​​​​है कि यह प्राकृतिक वास्तुकला है और ये शहरों को हरा-भरा रखने में मदद कर सकती हैं. इमारतों, पुलों और पार्कों में पेड़ लगाना अच्छा है, क्योंकि इससे बंजर और कंक्रीट बनते जा रहे हिस्सों को संतुलित किया जा सकता है. आर्किटेक्ट्स और शोधकर्ता इन पुलों का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं, ताकि शहरी इलाकों में भी इनकी बनावट और बुनियादी तत्वों का इस्तेमाल किया जा सके. दरअसल, लंदन में प्लेन ट्री से बैठने की छायादार जगहें बनाने के लिए एक प्रयोग भी चल रहा है. पेड़ की जड़ें बढ़ने पर कुर्सियों में ढल जाएंगी. यह सोचना ही कितना रोमांचक है! अब आप ऐसे कुछ प्रयोग अपने शहर में भी देख सकते हैं, इन संरचनाओं को विकसित होते देखन के लिए आपको शायद अगली पीढ़ी तक इंतजार भी न करना पड़े.

सपनों में नहीं असली में देखें: मेघालय के प्राकृतिक लिविंग ब्रिज!

कैसे पहुंचे यहां तक और किन बातों का रखना होगा ख्याल
अगर आपने अब तक कभी मेघालय की यात्रा नहीं की है, तो पहली बार घूमने के लिए यह सबसे अच्छा समय है. यह प्रदेश अपने राज्य बनने के 50वें वर्ष का जश्न मना रहा है और इस पूरे साल यहां कई तरह के आयोजन होते रहेंगे. हर तरह के यात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए यहां बहुत कुछ है. बिना देर किए तुरंत बनाएं प्लान. लिविंग रूम ब्रिज देखें, बड़े गुफाओं की सैर करें, स्थानीय व्यंजनों का लुत्फ उठाएं, रॉक कॉन्सर्ट के शौकीन हैं, तो वह भी है. साफ नदियों की सैर करें. वैज्ञानिक और भूवेत्ताओं को आकर्षित करने वाली गुफाओं की सैर करें. यह आपके लिए रोमांचित करने वाला अनुभव रहेगा. अब मेघालय घूमने का प्लान बना ही लें. यहां आपके लिए कुछ न कुछ खास जरूर है.

आखिर हम सब मेघालय युग में ही तो जी रहे हैं न!

(यह पार्टनर्ड पोस्ट है.)

Tags: Business news, Business news in hindi, Meghalaya, Tourism

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