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House Construction: लाखों-करोड़ों रुपये की लागत से बने भवन की नींव भी कई बार धंसने लगती है। फर्श और दीवारों में दरार आ जाती है। अब निर्माण से पहले ही ऐसे किसी तरह के नुकसान की जानकारी हो सकेगी। इसकी जांच में खर्च भी मकान की कुल लागत का अधिकतम 0.5 से 1 प्रतिशत तक ही आएगा।
गोरखपुर स्थित मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के भू तकनीकी विशेषज्ञ डॉ. विनय भूषण चौहान ने अलग-अलग प्रकार की मृदा पर 14 महीने तक शोध के बाद इसका निष्कर्ष निकाला है। कम्प्यूटर सिमलेशन से करीब एक हजार डेटा प्वाइंट्स निकाले गए हैं। हर तरह की मिट्टी के लिए चार्ट तैयार किया गया है। जर्नल ऑफ जियोटेक्निकल एंड जियोलॉजिकल में उनका यह शोध प्रकाशित हुआ है।
इस शोध मे नींव की भार वहन की क्षमता पर होने वाले दुष्प्रभाव का गणितीय आकलन फाइनिट एलिमेंट आधारित गणनात्मक सॉफ्टवेयर के माध्यम से किया गया है। महत्वपूर्ण निष्कर्ष कई ग्राफ और डिजाइन चार्ट के माध्यम से वृहद रूप मे उपलब्ध कराया गया है। इंजीनीयर्स के लिए एक उपयोगी टूल के रूप मे उपलब्ध होगा।
शोध में निकले ये निष्कर्ष
नींव की निचली सतह से नींव की चौड़ाई की करीब डेढ़ से दो गुना गहराई तक मृदा की जांच करानी चाहिए। मृदा की कोई प्रतिकूल परत नींव की निचली सतह से नींव की चौड़ाई की आधी दूरी तक में स्थित हो तो नींव की भार वहन क्षमता पर सर्वाधिक दुष्प्रभाव पड़ता है। मृदा की कोई परत मकान का भार वहन करने के लिए प्रतिकूल हो तो इंजीनियरिंग उपाय अपनाने चाहिए।
इनका भी रहा सहयोग
शोध में थम्म सैट यूनिवर्सिटी, थाईलैंड के प्रोफेसर सुरापर्ब और हो ची मिन सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, वियतनाम के प्रोफेसर लाई ने भी सहयोग दिया है। इसके अलावा एमएमएमयूटी के तीन पूर्व बीटेक छात्रों शिवेश, शिप्रा, श्रेयांश और एमटेक छात्रा अनन्या का भी सहयोग रहा।
कम खर्च में होती हैं जांच
डॉ. चौहान बताते हैं कि जांच पर आने वाली लागत का आधार तीन बातों पर निर्भर करता है। भवन का क्षेत्रफल, कितना ऊंचा भवन बनाया जाना है और उसके लिए मृदा की सैंपलिंग किस गहराई तक करानी है। सामान्यत प्रति मीटर गहराई तक की एसपीटी जांच का खर्च करीब एक हजार रुपये आता है।
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