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संजीव माहेश्वरी उर्फ संजीव जीवा यूपी के अंडरवर्ल्ड में एक ऐसा नाम बन गया था, जिसकी न केवल पश्चिमी यूपी में बल्कि पूर्वी यूपी के अपराधी गैंगों में पूरी धाक थी। उसके आतंक का यह असर था कि पूर्वी यूपी के अपराधी गैंग उसे हत्या करने के लिए सुपारी देकर बुलाने लगे। वह न केवल पश्चिमी व पूर्वी यूपी के दो खेमों में बंटे अंडरवर्ल्ड का एक अहम कारिंदा था, बल्कि यूपी और उत्तराखंड की जरायम की दुनिया के बीच सेतु का काम करता था।
पश्चिम के गिरोह नहीं लेते थे पूर्वी यूपी के वारदातों में रुचि डीपी यादव, मदन भैया, बदन सिंह बद्दो और सुशील मूछ…किसी ने भी पूर्वी यूपी के जरायम में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। उनकी जरायम की दुनिया गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर के इर्द-गिर्द तक ही सीमित रही। हरियाणा के अपराधी गिरोहों से भी उनकी निकटता रही। यदाकदा उन्हें जरूरत पड़ती तो पूर्वी यूपी में मदद के लिए यहां के बड़े माफिया को संपर्क कर अपने काम निकलवा लेते थे। इसके विपरीत अपनी शार्प शूटिंग क्षमता और हौसले के दम पर संजीव जीवा पश्चिमी यूपी के साथ ही पूर्वी और मध्य यूपी में खास अपराध करने के लिए बुलाया जाने लगा।
चाहे भाजपा विधायक कृष्णानंद राय की हत्या का मामला हो या फिर ब्रह्मदत्त द्विवेदी हत्याकांड, दोनों में ही जीवा की भूमिका अहम रही। एक पूर्व आईजी कहते हैं-कृष्णानंद राय हत्याकांड में जीवा के मुख्तार अंसारी के बुलावे पर गाजीपुर में रुकने और वहां हत्या के लिए जाल बिछाने के आरोप रहे। मुख्तार ने उसे जौनपुर के माफिया मुन्ना बजरंगी के कहने पर गैंग में मदद के लिए बुलाया।
हरिद्वार का आश्रम ठिकाना
किसी की हत्या करने के बाद जब भी संजीव को फरारी काटनी पड़ती, वह अपने करीबी मुन्ना बजरंगी के साथ ही मुंबई के करीब ठाणे में शरण लेता। यूपी एसटीएफ ने कई बार ठाणे में उसके लिए घेराबंदी की लेकिन हर बार वह बच निकला। उसके साथी फिरदौस को एसटीएफ ने मुंबई में मार गिराया था।
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