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हबीब जालिब पाकिस्तान के क्रांतिकारी कवि और राजनीतिज्ञ थे. उनकी नज़्में पाकिस्तान में दमन के खिलाफ आवाज बनीं. हबीब जालिब की कलम हमेशा गरीब, मजलूम और मजदूर के अधिकारों की मांग में उठती थी. उनकी कलम की धार और बुलंद आवाज को शांत करने के लिए तत्कालीन सरकार ने सत्ता के बल पर तमाम कोशिशें की लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके. क्योंकि वे ना तो हुक्म मानते थे और ना ही सत्ता के आगे झुकते थे. असल मायनों में जालिब आम जनता का कवि थे. वे सीधे-सपाट शब्दों में जालिमों की खिलाफत करते थे.
हबीब की हर नज़्म एक चिंगारी थी जो गरीबों के लिए मशाल और सत्ताधारियों को झुलसाने का काम करती थी. वे सत्ता की चापलूसी के खिलाफ थे. एक जगह लिखते हैं-
कुछ भी कहते हैं कहें शह के मुसाहिब जालिब
रंग रखना यही अपना, इसी सूरत लिखना
हम ने जो भूल के भी शह का कसीदा न लिखा
शायद आया इसी ख़ूबी की बदौलत लिखना।
हबीब जालिब का असली नाम हबीब अहमद था. 24 मार्च, 1928 को भारत के पंजाब स्थित होशियारपुर जिले में उनका जन्म हुआ था. 1947 में बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया. लेकिन हबीब जालिब ने कभी भी इस बंटवारे को दिल से स्वीकार नहीं किया.
सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करने की उन्होंने खूब सज़ा भुगती और कई बार जेल गए. पाकिस्तान में 1959 में जनरल अय्यूब ख़ान का मार्शल लॉ चल रहा था. देश के हालात बदतर थे. उस समय कोई भी उनके खिलाफ मुंह खोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. शायर से लेकर पत्रकार तक सब उनकी शान में कसीदे पढ़ रहे थे, उस समय हबीब जालिब लिखते हैं-
बीस घराने हैं आबाद
और करोड़ों हैं नाशाद
सद्र अय्यूब ज़िंदाबाद
आज भी हम पर जारी है
काली सदियों की बेदाद
सद्र अय्यूब ज़िंदाबाद
बीस रूपय्या मन आटा
इस पर भी है सन्नाटा।
हबीब जालिब की एक नज्म है ‘दस्तूर’. यह बगावती नज्म है और इसे पाकिस्तान में दमन के खिलाफ आवाम का घोषणा पत्र माना जाता है. कहते हैं कि ये नज़्म रातोरात पूरे पाकिस्तान का नारा बन गई-
दीप जिसका महलात ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशीयों को लेकर चले
वो जो साये में हर मस्लिहत के पले
ऐसे दस्तूर को, सुब्हे बेनूर को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता।
मैं भी ख़ायफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से
मैं भी मंसूर हूं कह दो अगियार से
क्यों डराते हो ज़िन्दां की दीवार से
ज़ुल्म की बात को, जेहल की रात को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता।
फूल शाख़ों पे खिलने लगे, तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे, तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे, तुम कहो
इस खुले झूठ को, जेहन की लूट को
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता।
तुमने लूटा है सदीयों हमारा सुकूं
अब ना हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूं
चारागर मैं तुम्हें किस तरह से कहूं
तुम नहीं चारागर, कोई माने मगर
मैं नहीं मानता, मैं नहीं मानता।
हबीब जालिब ने दो बड़ी ताकतें सत्ता और धर्म के खिलाफ शिद्दत से लड़ाई लड़ी. धर्म के ठेकेदारों को ललकारते हुए वे लिखते हैं-
बहुत मैंने सुनी है आपकी तक़रीर मौलाना
मगर बदली नहीं अब तक मेरी तक़दीर मौलाना
खुदारा सब्र की तलकीन अपने पास ही रखें
ये लगती है मेरे सीने पे बन कर तीर मौलाना
नहीं मैं बोल सकता झूठ इस दर्जा ढिठाई से
यही है जुर्म मेरा और यही तक़सीर मौलाना।
उन्होंने अपनी नज़्मों के माध्यम से जनरल अयूब खान का खूब विरोध किया. जनरल के सलाहकार और मंत्री भी जालिब की कलम का शिकार होते थे. आवाम में अयूब खान के मंत्रियों के खिलाफ खूब गुस्सा भरा था. इस पर हबीब जालिब लिखते हैं-
मैं ने उस से ये कहा
ये जो दस करोड़ हैं
जहल का निचोड़ हैं
उन की फ़िक्र सो गई
हर उमीद की किरन
ज़ुल्मतों में खो गई
ये ख़बर दुरुस्त है
उन की मौत हो गई
आज पाकिस्तान के हुकुमरान चीन के साथ गलबहियां करते नजर आते हैं. जालिब ने इसी नज़्म में पाकिस्तान की चीन के साथ दोस्ती का कड़ा विरोध किया था-
चीन अपना यार है
उस पे जां-निसार है
पर वहां है जो निज़ाम
उस तरफ़ न जाइए
उस को दूर से सलाम
दस करोड़ ये गधे
जिन का नाम है अवाम
क्या बनेंगे हुक्मरां
तू ‘यक़ीं’ है ये ‘गुमां’
अपनी तो दुआ है ये
सद्र तू रहे सदा
मैं ने उस से ये कहा।
पाकिस्तान में अयूब खान की सत्ता के बाद याह्या खान का दौर आया. लेकिन याह्या खान भी अयूब खान की तरह जालिम था. याह्या खान की तरफ इशारा करते हुए हबीब साब कहते हैं-
तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहां तख़्त-नशीं था
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था
कोई ठहरा हो जो लोगों के मुक़ाबिल तो बताओ
वो कहां हैं कि जिन्हें नाज़ बहुत अपने तईं था
आज सोए हैं तह-ए-ख़ाक न जाने यहां कितने
कोई शोला कोई शबनम कोई महताब-जबीं था।
12 मई, 1993 को हबीब जालिब का इंतकाल हो गया. पाकिस्तानी हुकूमत ने हबीब जालिब को सम्मानित करने का ऐलान किया लेकिन उनके परिजनों ने किसी भी प्रकार का इनाम या सम्मान लेने से इनकार कर दिया. पाकिस्तान एक बार फिर उसी दौर से गुजर रहा है. ऐसे में हबीब जालिब अपनी कलम के माध्यम से फिर से सामने आ खड़े होते हैं. जालिब अपने समय में, आज के दौर में और आने वाले समय में भी प्रासंगिक रहेंगे.
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Tags: Hindi Literature, Hindi poetry, Literature, Pakistan news
FIRST PUBLISHED : May 04, 2023, 13:34 IST
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