Home Life Style स्वाद का सफ़रनामा: ब्लड प्रेशर में फायदेमंद है लिसोड़ा, एलर्जी में भी मिलता है लाभ, हजारों साल पुराना है इतिहास

स्वाद का सफ़रनामा: ब्लड प्रेशर में फायदेमंद है लिसोड़ा, एलर्जी में भी मिलता है लाभ, हजारों साल पुराना है इतिहास

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स्वाद का सफ़रनामा: ब्लड प्रेशर में फायदेमंद है लिसोड़ा, एलर्जी में भी मिलता है लाभ, हजारों साल पुराना है इतिहास

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हाइलाइट्स

लिसोड़ा की लकड़ी काफी ठोस होती है इस कारण इसमें दीमक नहीं लगती.
माना जाता है कि लिसोड़ा में पाया जाने वाला चिपचिपा गूदा ही चमत्कारी है.

Swad Ka Safarnama: लिसोड़ा एक देसी या कहें कि जंगली फल है. इसका पेड़ इतना ‘बलशाली’ है कि यह हिमालय से लेकर राजस्थान-गुजरात के गर्मीले और रेतीले इलाकों में भी उग जाता है. इस चिपचिपे फल की विशेषता यह है कि अगर ब्लड प्रेशर से परेशान हैं तो यह उसके शमन में भूमिका अदा करता है. शरीर में होने वाली एलर्जी में भी यह लाभकारी है. आयुर्वेद में इस फल की विशेषताओं का वर्णन है. यह हजारों वर्ष पुराना जंगली फल है और भारत और आसपास का क्षेत्र इसकी उत्पत्ति मानी जाती है.

लिसोड़े का अचार खूब खाया जाता है

लिसोड़ा (Lisoda/Glue Berries) मध्यम आकार के बेर के समान गोल होता है. जब यह कच्चा होता है तो हरा दिखाई देता है. पकने के बाद यह पीला और कुछ-कुछ पारदर्शी हो जाता है. कच्चे लिसोड़े की सब्जी बनाई जाती है और इसका अचार तो बेहद मशहूर है. जब यह पक जाता है तो इसका गूदा मीठा और चिपचिपा हो जाता है. तब इसे खाया जा सकता है. पेड़ पर यह गुच्छों में उगता है और इसके स्वाद में हलका सा कसैलापन भी होता है. इसकी छाल और पत्ते लाभकारी हैं. कई ग्रामीण इलाकों में पान की बजाय इसकी छाल को चबाया जाता है, वह मुंह और जीभ को लाल कर देती है.

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औषधीय गुणों से भरपूर लिसोड़ा फल काफी लाभकारी होता है. Image-shutterstock

माना जाता है कि इसकी लकड़ी अत्यधिक ठोस होती है इस कारण इसमें दीमक नहीं लगती. मान्यता है कि इसकी लकड़ी को घर में रखने से शान्ति रहती है तथा घर में किसी प्रकार के जहरीले कीट-पतंगे नहीं आते. गांवों में इसकी लकड़ी की मथानी बनाई जाती है.

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‘चरकसंहिता’ और ‘सुश्रुतसंहिता’ में वर्णन

लिसोड़ा फल का इतिहास बेहद प्राचीन है. फूड हिस्टोरियन इसे जंगली फल मानते हैं. उनका कहना है कि हजारों वर्ष पूर्व यह भारत के हिमालयी क्षेत्र से लेकर नेपाल, म्यांमार, ताइवान, थाईलैंड, मलेशिया, चीन, पोलिनेशिया, ऑस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं. भारत में सातवीं-आठवीं ईसा पूर्व लिखे गए आयुर्वेदिक ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ में इसका वर्णन है. इसे पिच्छिल कहा गया है. ग्रंथ के अनुसार यह वात-पित्त और कफ का शमन करता है. इसे ‘बलशाली’ फल माना गया है. भारत के अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ में इसके औषधीय गुणों का वर्णन है. इस ग्रंथ में इसे बहुवार कहा गया है. ऐसा भी माना जाता है कि वाल्मीकि रामायण में उडालकास पेड़ का उल्लेख है जो संभवत लिसोड़ा ही है. महाभारत में ऐसे ही ग्रंथ का उल्लेख आया

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माना जाता है कि इस फल में पाया जाने वाला चिपचिपा गूदा ही चमत्कारी है. Image-shutterstock

है. भारतीय जड़ी-बूटियों, फलों व सब्जियों पर व्यापक रिसर्च करने वाले जाने-माने आयुर्वेद विशेषज्ञ आचार्य बालकिशन के अनुसार लिसोड़ा मधुर, तिक्त, कटु, कषाय, शीत, चिकना और कफ-पित्तशामक होता है. यह पेट के लिए लाभकारी, शरीर के विषों का शमन करने वाला है. इसका कच्चा फल रूक्ष, शीतल और मधुर और पका फल पुष्टिकारक और रक्तदोष को भी दूर करता है.

फल में है एंटी-हाइपरटेंसिव प्रभाव

जंगली फल लिसोड़े के गुण आश्चर्यजनक हैं, जो इसे विशेष बनाते हैं. मुंबई यूनिवर्सिटी के पूर्व डीन व वैद्यराज दीनानाथ उपाध्याय का कहना है कि एक शोध के अनुसार इस फल में एंटी-हाइपरटेंसिव प्रभाव होता है. इसलिए यह ब्लडप्रेशर को कंट्रोल करने में प्रभावी है. यह ऑक्सीडेटिव तनाव (ब्लड सर्कुलेशन से पैदा होने वाला स्ट्रेस) को कम कर सकता है. ऐसा माना जाता है कि इस फल में पाया जाने वाला चिपचिपा गूदा ही चमत्कारी है. आयुर्वेद में लिसोड़ा दाद, खाज, खुजली में प्रभावी माना जाता है. इसके चिकने पेस्ट और गुठली को पीसकर उसके लेप को प्रभावी त्वचा पर लगाया जाए तो यह तुरंत लाभ पहुंचाने लगता है. यह इलाज हजारों वर्षों से किया जा रहा है. अगर गले की खराश लंबे समय से कम नहीं हो रही है तो लिसोड़े को उबालकर उसका काढ़ा बनाकर पीने से लाभ मिलता है.

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शरीर के लिए शक्तिवर्धक भी माना जाता है

उनका यह भी कहना है कि लिसोड़ा में पोषक तत्व समुचित मात्रा में उपलब्ध हैं, इसलिए इसे शरीर के लिए ‘शक्तिवर्धक’ माना जाता है. इसी छाल और पत्तियों को सूखाकर चूर्ण बनाया जाता है, जिसका आयुर्वेद में कई बीमारियों का शमन करने के लिए किया जाता है. यह जोड़ों के दर्द और सूजन जैसी समस्याओं में भी कारगर है. अगर दांत में दर्द है तो इसके पेड़ की छाल को पानी में उबालकर काढ़ा तैयार कर ठंडा होने पर कुल्ला किया जाए तो आराम मिलता है. यह ऐसा जंगली फल है जिसे बहुत अधिक मात्रा में नहीं खाया जा सकता है. अगर ज्यादा खा लिया तो यह मुंह का स्वाद अकबका कर देगा. पेट में दर्द भी संभव है.

Tags: Food, Lifestyle

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