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अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का काम जोरों पर चल रहा है और रामलला 22 जनवरी को विराजमान होने वाले हैं। 1528 से अब तक करीब भारतीय सभ्यता के 500 सालों के सफर में यह अवसर सांस्कृतिक प्रवाह के बने रहने का प्रतीक है। कैसे एक मंदिर ढह जाता है, किंतु उसे कायम करने के लिए जीवटता खत्म नहीं होती। मंदिर के साथ साहस नहीं ढहता और भगवान राम के लिए आस्था का दीप प्रज्ज्वलिता ही रहता है। अब आस्था के वे दीप 22 जनवरी को रामज्योति के तौर पर जलने वाले हैं। अयोध्या के किसी साधु से लेकर कश्मीर में फारुक अब्दुल्ला तक राम भजन गा रहे हैं। वास्तव में भगवान राम भारत के सांस्कृतिक प्रतीक रहे हैं।
मर्यादा पुरुषोत्तम के तौर पर जीवन मूल्यों की सीख देते रहे हैं। यही वजह थी कि हिंदुओं के अलावा अन्य मतावंलबियों की भी उनमें आस्था रही है। यही नहीं भारत विभाजन की मांग करने वाले मुख्य लोगों में से एक अल्लामा इकबाल ने भी एक दौर में उनकी प्रशंसा में एक नज्म लिखी थी। उन्होंने भगवान राम से ही दुनिया में हिंदुस्तान का नाम होने की बात भी इस नज्म में लिखी थी। अल्लामा इकबाल लिखते हैं, ‘इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक-सरिश्त, मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद। है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़,अहल-ए-नज़र समझते हैं इस को इमाम-ए-हिंद।’
इस नज्म में मलक का अर्थ देवता से है, जबकि सरिश्त का अर्थ ऊंचे आसन वाला होता है। इस तरह उनकी नज्म की पंक्तियों का अर्थ हुआ- इस देश में हजारों देवता जैसे लोग हुए हैं। उनके ही दम से दुनिया में हिंद यानी हिन्दुस्तान का नाम है। राम के वजूद पर हमें नाज है और हम सभी उन्हें इमाम-ए-हिंद यानी देश को दिशा देने वाला नायक समझते हैं।
उनकी नज्म कुछ इस प्रकार थी-
लबरेज़ है शराब-ए-हक़ीक़त से जाम-ए-हिंद
सब फ़लसफ़ी हैं ख़ित्ता-ए-मग़रिब के राम-ए-हिंद
ये हिन्दियों की फ़िक्र-ए-फ़लक-रस का है असर
रिफ़अत में आसमाँ से भी ऊँचा है बाम-ए-हिंद
इस देस में हुए हैं हज़ारों मलक-सरिश्त
मशहूर जिन के दम से है दुनिया में नाम-ए-हिंद
है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं इस को इमाम-ए-हिंद
एजाज़ इस चराग़-ए-हिदायत का है यही
रौशन-तर-अज़-सहर है ज़माने में शाम-ए-हिंद
तलवार का धनी था शुजाअ’त में फ़र्द था
पाकीज़गी में जोश-ए-मोहब्बत में फ़र्द था।
यही नहीं अल्लामा इकबाल ने नया शिवाला के नाम से भी एक नज्म लिखी थी। जिसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-
सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें।
दुनिया के तीरथों से ऊँचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आसमाँ से इस का कलस मिला दें।
हर सुब्ह उठ के गाएँ मंतर वो मीठे मीठे
सारे पुजारियों को मय पीत की पिला दें।
शक्ति भी शांति भी भगतों के गीत में है
धरती के बासीयों की मुक्ती प्रीत में है।
पर अल्लामा का ‘इकबाल’ पाकिस्तान में हो गया
हालांकि अल्लामा इकबाल की विचारधारा में एक दौर में बड़ा बदलाव आ गया था और वह मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क की मांग करने वाले नेता बन गए थे। चौधरी रहमत अली, मोहम्मद अली जिन्ना, लियाकत अली और अल्लामा इकबाल उन प्रमुख लोगों में से थे, जिन्होंने अलग मुल्क की मांग का विचार पेश किया। यही नहीं जिस अल्लामा इकबाल ने कभी सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा लिखा था, उसी ने फिर पाकिस्तान पर एक गीत लिखा था। गौरतलब तथ्य यह भी है कि इकबाल का मूलत: कश्मीरी पंडित थे। उनके परिवार ने 17वीं सदी में इस्लाम स्वीकार किया था और वे कुलगाम के रहने वाले थे। सर तेज बहादुर सप्रू भी उनके ही खानदान से जुड़े बताए जाते हैं।
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